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UP Police के ‘एनकाउंटर नैरेटिव’ पर हाईकोर्ट की नजर! गोली पैर में लगने से लेकर FIR और जांच तक, 2026 में कोर्ट ने उठाए कई बड़े सवाल

उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की सख्ती लगातार बढ़ रही है। 2026 में कोर्ट के कई आदेशों में पुलिस के एनकाउंटर नैरेटिव पर गंभीर सवाल उठे हैं—कभी आरोपी के घुटने के नीचे ही गोली लगने पर, तो कभी एनकाउंटर की अलग FIR और स्वतंत्र जांच को लेकर। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पुलिस को आत्मरक्षा में बल प्रयोग का अधिकार है, लेकिन एनकाउंटर के नाम पर कानून और न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता।

Sonali07 सित. 2026, 05:08 PM IST
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UP Police के ‘एनकाउंटर नैरेटिव’ पर हाईकोर्ट की नजर! गोली पैर में लगने से लेकर FIR और जांच तक, 2026 में कोर्ट ने उठाए कई बड़े सवाल

इलाहाबाद हाईकोर्ट के 2026 के कई आदेश उत्तर प्रदेश पुलिस की एनकाउंटर कार्रवाई और उसके बाद पेश की जाने वाली कहानी पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि पुलिस को वास्तविक आत्मरक्षा में बल प्रयोग का अधिकार जरूर है, लेकिन एनकाउंटर के नाम पर पुलिस को आपराधिक न्याय व्यवस्था से बाहर नहीं रखा जा सकता। जनवरी से अगस्त तक के मामलों में अदालत ने पुलिस की कार्रवाई, अलग FIR, स्वतंत्र जांच और कथित एनकाउंटर के पैटर्न पर सख्त टिप्पणियां की हैं।

‘एक गोली चली और आरोपी के घुटने के नीचे लगी’

अगस्त 2026 के Chotkau Alias Allauddin v. State of U.P. मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस के एनकाउंटर नैरेटिव पर बेहद गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अक्सर किसी आरोपी को पकड़ने के बाद एक दूसरी FIR सामने आती है, जिसमें पुलिस की ओर से आरोप लगाया जाता है कि गिरफ्तारी के दौरान आरोपी ने पुलिस टीम पर अंधाधुंध फायरिंग की। कोर्ट ने इस कथित पैटर्न पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम तौर पर पुलिसकर्मियों की वर्दी तक को गोली नहीं छूती और पूरी टीम सुरक्षित रहती है, जबकि पुलिस की ओर से चलाई गई गोली आरोपी के घुटने या उससे नीचे लग जाती है। अदालत की यह टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सवाल उठता है कि क्या हर गिरफ्तारी के बाद पुलिस पर फायरिंग की कहानी और आरोपी के पैर में गोली लगने की घटनाओं को महज संयोग माना जा सकता है।

जनवरी में भी कोर्ट ने उठाया था सवाल

यह पहली बार नहीं था जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस तरह की कार्रवाई पर चिंता जताई। जनवरी 2026 में Raju alias Rajkumar v. State of U.P. मामले में भी अदालत ने पुलिस के उस तौर-तरीके पर सवाल उठाया था, जिसमें मामूली मामलों में भी पुलिस की ओर से फायरिंग के बाद उसे एनकाउंटर का रूप दिए जाने की आशंका सामने आई।

इन दोनों मामलों को साथ देखने पर अदालत की चिंता का एक पैटर्न सामने आता है—पुलिस कार्रवाई के दौरान गोली चलने और उसके बाद तैयार होने वाले आधिकारिक संस्करण की स्वतंत्र न्यायिक जांच।

एनकाउंटर का मतलब कानून से ऊपर होना नहीं

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा है कि पुलिस को कभी बल प्रयोग करने का अधिकार नहीं है। वास्तविक आत्मरक्षा की स्थिति में पुलिस द्वारा आवश्यक बल प्रयोग कानून के दायरे में हो सकता है। लेकिन अदालत का जोर इस बात पर है कि पुलिस द्वारा किया गया कोई भी बल प्रयोग न्यायिक जांच से परे नहीं हो सकता। यदि किसी व्यक्ति को पुलिस की गोली लगती है या उसकी मौत एनकाउंटर में होती है, तो घटना की परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच जरूरी है।

यही लोकतांत्रिक आपराधिक न्याय व्यवस्था की बुनियादी शर्त है।

‘आरोपी’ को कोर्ट से पहले सजा नहीं

इन टिप्पणियों का एक और महत्वपूर्ण पहलू है—जनता और मीडिया की नजर में आरोपी की छवि। बलात्कार, हत्या या अन्य गंभीर अपराधों में आरोपी बनाए गए व्यक्ति के खिलाफ स्वाभाविक रूप से जन आक्रोश पैदा हो सकता है। ऐसे मामलों में एनकाउंटर को तत्काल न्याय या ‘इंसाफ’ के रूप में पेश किए जाने का खतरा रहता है। लेकिन अदालत ने जिस मूल सवाल की ओर ध्यान दिलाया है, वह बेहद अहम है—अगर किसी आरोपी को अदालत में मुकदमा चलाए बिना ही पुलिस कार्रवाई के जरिए सजा मिल जाए, तो फिर न्यायिक प्रक्रिया और अदालतों की भूमिका क्या रह जाएगी?

स्वतंत्र जांच क्यों जरूरी?

एनकाउंटर के मामलों में पुलिस ही शिकायतकर्ता, कार्रवाई करने वाली एजेंसी और घटना की शुरुआती जांच करने वाली संस्था हो, तो निष्पक्षता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। इसी वजह से ऐसी घटनाओं में स्वतंत्र और प्रभावी जांच का महत्व बढ़ जाता है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के हालिया आदेशों से यह संदेश निकलता है कि एनकाउंटर की कहानी केवल पुलिस के बयान के आधार पर स्वीकार नहीं की जा सकती। घटनास्थल के साक्ष्य, मेडिकल रिकॉर्ड, हथियार, गोलियों की दिशा, फोरेंसिक सामग्री और घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि जैसे पहलुओं की जांच जरूरी है।

2026 में हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश

जनवरी के Raju alias Rajkumar मामले से लेकर अगस्त के Chotkau alias Allauddin मामले तक, इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणियां उत्तर प्रदेश में एनकाउंटर पुलिसिंग को लेकर न्यायिक निगरानी की बढ़ती सख्ती को दिखाती हैं।

कोर्ट का संदेश सीधा है—एनकाउंटर हो सकता है, लेकिन एनकाउंटर कानून से ऊपर नहीं हो सकता।

पुलिस को आत्मरक्षा का अधिकार है, लेकिन हर गोलीबारी की कहानी को कानून की कसौटी पर परखा जाएगा। किसी आरोपी के खिलाफ गंभीर आरोप हों, तब भी उसकी दोषसिद्धि अदालत में साक्ष्यों के आधार पर ही होनी चाहिए। यही कानून के शासन और न्यायपालिका की स्वतंत्र भूमिका का मूल आधार है।