law-order
42 साल पुरानी अपील पर इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला! फरार आरोपी को 1982 से नहीं ढूंढ पाई पुलिस, कोर्ट बोला- ‘अनिश्चितकाल तक इंतजार नहीं कर सकते’
42 साल से लंबित हत्या के प्रयास की अपील पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है जो फरार आरोपियों के मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि वह किसी आरोपी के पकड़े जाने और अदालत के सामने पेश होने का अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए बाध्य नहीं है। आरोपी फूलमती ने 1982 में ट्रायल कोर्ट से मिली 4 साल की सजा के खिलाफ अपील दाखिल की थी, लेकिन बाद में वह फरार हो गई और लगातार अदालत की प्रक्रिया से दूर रही। अब हाईकोर्ट ने उसकी गैरमौजूदगी में ही अपील के मेरिट पर सुनवाई कर उसे खारिज कर दिया।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 42 साल पुरानी एक आपराधिक अपील का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी फरार आरोपी की वजह से न्यायिक प्रक्रिया को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता। अदालत ने आरोपी की गैरमौजूदगी में ही उसकी अपील पर मेरिट के आधार पर फैसला सुनाया और अपील खारिज कर दी। मामला फूलमती नाम की आरोपी से जुड़ा है, जिसने 1982 में ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 के तहत दी गई सजा को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दाखिल की थी। इस मामले में ट्रायल कोर्ट ने उसे हत्या के प्रयास के अपराध में दोषी ठहराते हुए चार साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
6 जुलाई 1982 को मिली थी जमानत
हाईकोर्ट की जस्टिस वाणी रंजन अग्रवाल की एकल पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही थी। रिकॉर्ड के मुताबिक अपील दाखिल होने और स्वीकार किए जाने के बाद 6 जुलाई 1982 को फूलमती को जमानत दे दी गई थी। लेकिन जमानत मिलने के बाद आरोपी लगातार अदालत के सामने पेश नहीं हुई। यानी जिस स्वतंत्रता का लाभ उसे जमानत के रूप में मिला था, उसका इस्तेमाल करने के बाद वह न्यायिक प्रक्रिया से दूर होती चली गई।
2007 और 2013 में जारी हुए वारंट
कोर्ट ने रिकॉर्ड पर गौर करते हुए पाया कि आरोपी की गैरमौजूदगी को देखते हुए उसके खिलाफ कई बार कार्रवाई की गई। 2007 में उसके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया गया। इसके बाद 2013 में दोबारा जमानती वारंट जारी किया गया। पुलिस की रिपोर्ट में बताया गया कि आरोपी अपने दिए गए पते पर नहीं मिली। इसके बाद 2013 में CrPC की धारा 82 और 83 के तहत कार्यवाही शुरू की गई। वहीं 2014 में आरोपी के जमानतदारों के खिलाफ CrPC की धारा 446 के तहत कार्यवाही की गई।
42 साल तक अदालत क्यों करती रही इंतजार?
हाईकोर्ट के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही था कि क्या आरोपी के फरार रहने के कारण उसकी अपील को हमेशा लंबित रखा जा सकता है। अदालत ने रिकॉर्ड में दर्ज प्रयासों पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि आरोपी को तलाशने और उसे अदालत के सामने पेश कराने के लिए प्रयास किए गए, लेकिन वह सामने नहीं आई। यहां तक कि 2024 में भी आरोपी को तलाशने के लिए गंभीर प्रयास किए गए, लेकिन उसका पता नहीं चल पाया।
‘हम हमेशा इंतजार नहीं कर सकते’
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि न्यायिक प्रक्रिया किसी आरोपी के फरार रहने की वजह से हमेशा के लिए रुकी नहीं रह सकती। अदालत ने कहा कि वह आरोपी के ट्रेस होने और अदालत के सामने पेश किए जाने का “perennially” यानी अनिश्चितकाल तक इंतजार करने के लिए बाध्य नहीं है। इस आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपी की अनुपस्थिति में ही 1982 में दाखिल की गई उसकी अपील के मेरिट पर विचार किया।
अपील मेरिट पर खारिज
कोर्ट ने केवल इस आधार पर अपील खारिज नहीं की कि आरोपी अदालत में मौजूद नहीं थी। बल्कि हाईकोर्ट ने मामले के मेरिट पर विचार करने के बाद अपील को खारिज किया। इससे यह महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है कि फरार आरोपी की गैरमौजूदगी में अपील पर सुनवाई करना और केवल उसकी गैरमौजूदगी के कारण अपील खारिज करना दो अलग-अलग बातें हैं।
फैसले का व्यापक असर
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला उन पुराने आपराधिक मामलों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देता है, जिनमें आरोपी लंबे समय से फरार हैं और उनकी अपीलें वर्षों से लंबित पड़ी हैं। अदालत ने यह संकेत दिया है कि किसी आरोपी को न्यायिक प्रक्रिया का लाभ उठाने के साथ-साथ अदालत के आदेशों और सुनवाई में उपस्थित होने की जिम्मेदारी से पूरी तरह बचने की अनुमति नहीं दी जा सकती। फूलमती को 1982 में जमानत मिली थी, लेकिन इसके बाद वह अदालत से अनुपस्थित रही। 2007 और 2013 में वारंट, 2013 में धारा 82-83 की कार्रवाई और 2014 में जमानतदारों के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद वह अदालत के सामने नहीं आई। 42 साल बाद हाईकोर्ट ने अब साफ कर दिया कि किसी फरार आरोपी की वजह से न्याय का पहिया हमेशा नहीं रोका जा सकता। अदालत ने उसकी गैरमौजूदगी में अपील के मेरिट पर फैसला किया और 1982 की दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपील को खारिज कर दिया।
