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बेरोजगार महिला के नाम जमीन है तो उसे पैतृक संपत्ति नहीं मान सकते, Karnataka HC का बड़ा फैसला
क्या किसी महिला के पास अपनी नौकरी या कमाई नहीं है, तो उसके नाम दर्ज जमीन अपने-आप संयुक्त परिवार की संपत्ति बन जाएगी? कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस सवाल पर अहम फैसला सुनाते हुए साफ किया है कि सिर्फ बेरोजगार या गृहिणी होने के आधार पर महिला की संपत्ति को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि इसके लिए ठोस सबूत जरूरी है।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी महिला के बेरोजगार होने और उसकी कोई स्वतंत्र आय न होने मात्र से उसके नाम खरीदी गई संपत्ति को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब तक यह साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य मौजूद न हों कि संपत्ति संयुक्त परिवार के धन से खरीदी गई थी, तब तक महिला के नाम दर्ज संपत्ति को उसकी व्यक्तिगत और पूर्ण संपत्ति माना जाएगा। जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस तारा वितस्ता गंजू की पीठ ने Rajesh Exports v. B Devaraj मामले में यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने 2009 में ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें संपत्ति में दो बेटों और एक बेटे की पत्नी को हिस्सा दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
मामला बेंगलुरु की एक जमीन से जुड़ा था। यह संपत्ति मूल रूप से लालिथम्मा के नाम दर्ज थी। बाद में उनके बेटे एस. बालासुब्रमण्य ने अपनी मां से विरासत में मिली इस संपत्ति को वर्ष 2004 में Rajesh Exports नाम की कंपनी को बेच दिया। बिक्री के कुछ समय बाद बालासुब्रमण्य लापता हो गए। इसके बाद उनके दो बेटों और पत्नी ने जमीन की बिक्री को चुनौती देते हुए सिविल कोर्ट का रुख किया। उनका दावा था कि यह जमीन संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति थी और बालासुब्रमण्य अकेले इसे बेच नहीं सकते थे।
ट्रायल कोर्ट ने क्या माना?
वर्ष 2009 में ट्रायल कोर्ट ने plaintiffs के पक्ष में फैसला दिया और माना कि संपत्ति संयुक्त परिवार की संपत्ति थी। अदालत ने उन्हें संपत्ति में 1/4 हिस्से का हकदार माना।
ट्रायल कोर्ट ने इस निष्कर्ष के पीछे यह आधार लिया था कि लालिथम्मा एक बेरोजगार गृहिणी थीं और उनके पास आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं था। इसलिए अदालत ने यह अनुमान लगाया कि उनके नाम पर खरीदी गई जमीन संयुक्त परिवार के धन से खरीदी गई होगी।
हाईकोर्ट ने इस सोच को गलत माना
कर्नाटक हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की इस reasoning को स्वीकार नहीं किया। पीठ ने कहा कि केवल इस आधार पर कि लालिथम्मा महिला थीं और बेरोजगार थीं, यह मान लेना उचित नहीं है कि उनके पास संपत्ति खरीदने के लिए अपने स्वयं के पैसे नहीं हो सकते थे।
अदालत ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि हिंदू महिला के नाम दर्ज संपत्ति को उसकी पूर्ण संपत्ति माना जाएगा, जब तक इसके विपरीत कोई ठोस प्रमाण सामने न आए।
संयुक्त परिवार की रकम से खरीद का सबूत नहीं
हाईकोर्ट ने पाया कि plaintiffs यह साबित करने में विफल रहे कि लालिथम्मा के नाम खरीदी गई संपत्ति वास्तव में संयुक्त परिवार के धन से खरीदी गई थी। अदालत ने कहा कि केवल अनुमान के आधार पर किसी महिला की व्यक्तिगत संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति में नहीं बदला जा सकता।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संयुक्त परिवार के धन से संपत्ति खरीदे जाने का दावा करने वाले पक्ष पर इसे साबित करने का भार होता है। इस मामले में plaintiffs उस burden को पूरा नहीं कर सके।
ट्रायल कोर्ट का फैसला रद्द
इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने 2009 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और Rajesh Exports की अपील स्वीकार कर ली। इस फैसले का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि महिला की नौकरी या आय का होना ही उसकी संपत्ति के अधिकार का आधार नहीं है। केवल गृहिणी या बेरोजगार होने के कारण उसके नाम दर्ज संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति नहीं माना जा सकता। इसके लिए परिवार के धन से संपत्ति खरीदने का ठोस और विश्वसनीय प्रमाण आवश्यक होगा।
