law-order
कृषि जमीन की सीमा Advocate Commissioner की रिपोर्ट से तय नहीं कर सकता Civil Court, इलाहाबाद HC का बड़ा फैसला
कृषि जमीन की सीमा को लेकर विवाद है तो अब सिर्फ Advocate Commissioner की रिपोर्ट के आधार पर सिविल कोर्ट उस जमीन की हद तय नहीं कर सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि दो सटी हुई कृषि जोतों की वास्तविक सीमा तय करने का काम U.P. Revenue Code, 2006 की धारा 24 के तहत सक्षम राजस्व प्राधिकरण को करना है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी सीमा विवाद को केवल ‘इंजंक्शन का मुकदमा’ बताकर सिविल कोर्ट अपनी सीमा से बाहर जाकर डिमार्केशन नहीं कर सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कृषि भूमि के सीमांकन से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र की सीमा स्पष्ट कर दी है। कोर्ट ने कहा कि जब किसी मुकदमे में असली विवाद दो पड़ोसी कृषि भूखंडों की वास्तविक सीमा यानी boundary को लेकर हो, तो सिविल कोर्ट Advocate Commissioner द्वारा तैयार किए गए नक्शे या रिपोर्ट के आधार पर उस सीमा का अंतिम निर्धारण नहीं कर सकता। जस्टिस अनिल कुमार-X ने Hamid Khan And 4 Others v. Jwala Prasad And 13 Others मामले में यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें Advocate Commissioner की रिपोर्ट और अन्य सामग्री के आधार पर कृषि भूमि की सीमाएं निर्धारित कर दी गई थीं।
क्या था पूरा मामला?
मामला हाथरस के मौजा शेरपुर का था। वर्ष 2001 में वादियों ने करीब 0.60 एकड़ जमीन को लेकर स्थायी निषेधाज्ञा यानी permanent injunction के लिए मुकदमा दायर किया था। विवाद खसरा संख्या 815 की जमीन से जुड़ा था। वादियों का आरोप था कि पड़ोसी जमीन के मालिक उनकी जमीन के एक हिस्से पर निर्माण करने की कोशिश कर रहे हैं। दूसरी ओर, प्रतिवादियों का कहना था कि वादियों ने खसरा संख्या 815 की दक्षिणी सीमा गलत तरीके से निर्धारित कर रखी है और इससे उनकी adjoining जमीन यानी खसरा संख्या 816 और 817 का हिस्सा भी विवादित जमीन में शामिल किया जा रहा है।
निचली अदालतों ने क्या किया?
ट्रायल कोर्ट ने 2023 में वादियों के पक्ष में फैसला दिया। कोर्ट ने plaint map, revenue map और Amin की रिपोर्ट को आधार बनाया और जमीन की सीमाओं को निश्चित माप के साथ अपने decree में दर्ज कर दिया। First Appellate Court ने भी ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला दूसरी अपील के रूप में हाईकोर्ट पहुंचा। प्रतिवादियों ने दलील दी कि मामला वास्तव में injunction का नहीं बल्कि कृषि भूमि के boundary demarcation का है। इसलिए इसका निर्धारण Revenue Authority द्वारा U.P. Revenue Code के तहत किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने Advocate Commissioner की रिपोर्ट पर क्या कहा?
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि Advocate Commissioner की रिपोर्ट को साक्ष्य के तौर पर देखा जा सकता है, लेकिन वह वैधानिक सर्वे और सीमांकन का विकल्प नहीं बन सकती। कोर्ट ने कहा कि यदि गाटा नंबर को लेकर विवाद नहीं है, लेकिन उस गाटा में वास्तव में कितनी और कौन-सी जमीन आती है, इसे लेकर विवाद है, तो यह मूल रूप से demarcation का मामला है। ऐसे मामले में U.P. Revenue Code, 2006 की धारा 24 विशेष प्रक्रिया उपलब्ध कराती है। इस प्रावधान के तहत सक्षम राजस्व अधिकारी कृषि भूमि की सीमा संबंधी विवाद की जांच कर सकता है।
‘Injunction Suit’ कह देने से अधिकार नहीं बदल जाता
हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि कोई पक्ष सिर्फ अपने मुकदमे को injunction suit के रूप में पेश करके सिविल कोर्ट को कृषि भूमि की सीमा निर्धारित करने का अधिकार नहीं दे सकता। अदालत ने माना कि यदि सिविल कोर्ट किसी Commissioner की रिपोर्ट के आधार पर जमीन की लंबाई-चौड़ाई और सीमा तय कर देता है, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से वही काम कर रहा होगा जिसे कानून ने Revenue Authority को सौंपा है। इससे एक ही जमीन के संबंध में अलग-अलग मंचों पर अलग-अलग सीमांकन होने का खतरा भी पैदा हो सकता है।
दोनों निचली अदालतों के फैसले रद्द
हाईकोर्ट ने माना कि निचली अदालतों ने सिर्फ निषेधाज्ञा जारी नहीं की, बल्कि अपने आदेश में जमीन की वास्तविक सीमा और क्षेत्रफल को निर्धारित कर दिया था। इस तरह अदालत ने प्रभावी रूप से adjoining agricultural holdings का demarcation कर दिया। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और First Appellate Court दोनों के फैसले और decrees को रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने वादियों के लिए रास्ता बंद नहीं किया। कोर्ट ने उन्हें U.P. Revenue Code के तहत सक्षम Revenue Authority के सामने उचित remedy लेने की स्वतंत्रता दी।
फैसले का सीधा संदेश
इस फैसले से साफ है कि कृषि भूमि के वास्तविक सीमांकन का सवाल महज एक सामान्य civil dispute नहीं माना जा सकता, जब उसके लिए कानून में विशेष राजस्व व्यवस्था मौजूद हो। U.P. Revenue Code की धारा 24 सीमा विवाद के लिए विशेष statutory mechanism उपलब्ध कराती है। यानी कृषि जमीन की सीमा को लेकर विवाद होने पर केवल Advocate Commissioner की रिपोर्ट के आधार पर सिविल कोर्ट से डिमार्केशन कराने की कोशिश पर्याप्त नहीं होगी। वास्तविक सीमांकन के लिए संबंधित Revenue Authority की वैधानिक प्रक्रिया अपनानी होगी।
