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‘कायर जज कहलाने से बेहतर मौत’: UP के जज का बड़ा बयान, बोले- माफिया और अपराधियों को फायदा पहुंचाने के लिए मेरे कोर्ट से वापस लिए गए गंभीर केस

कायर जज कहलाने से बेहतर है मौत!’—मुजफ्फरनगर की अदालत से जज रवि कुमार दिवाकर के इस बयान ने न्यायपालिका से लेकर यूपी के अपराध जगत तक हलचल मचा दी है। पत्नी को जिंदा जलाने वाले नादिम को मौत की सजा सुनाते हुए जज ने दावा किया कि उनके कोर्ट से हत्या और अन्य गंभीर मामलों की फाइलें माफिया और अपराधियों को फायदा पहुंचाने के लिए वापस ली गईं। जज के इन आरोपों ने न्यायिक स्वतंत्रता और प्रभावशाली अपराधियों के दबाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Sonali08 सित. 2026, 07:43 PM IST
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‘कायर जज कहलाने से बेहतर मौत’: UP के जज का बड़ा बयान, बोले- माफिया और अपराधियों को फायदा पहुंचाने के लिए मेरे कोर्ट से वापस लिए गए गंभीर केस

मुजफ्फरनगर की अदालत में सोमवार, 7 सितंबर 2026 को सुनाया गया एक फैसला सिर्फ मौत की सजा के कारण चर्चा में नहीं है। Additional District & Sessions Judge Ravi Kumar Diwakar ने फैसला सुनाते हुए अपने ही कोर्ट से गंभीर आपराधिक मामलों की फाइलें वापस लिए जाने को लेकर बेहद गंभीर टिप्पणियां कीं। जज ने आरोप लगाया कि कुछ गंभीर मामलों को उनके कोर्ट से इसलिए वापस लिया गया ताकि माफिया, गैंगस्टर और अपराधियों को फायदा मिल सके। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से वह बेहद आहत और दुखी हैं। जज दिवाकर ने साफ शब्दों में कहा कि वह ‘कायर जज’ कहलाने के बजाय मरना पसंद करेंगे। उन्होंने कहा कि जब तक वह अपने सिद्धांतों के मुताबिक काम कर सकते हैं, तब तक न्यायिक सेवा में बने रहेंगे, लेकिन यदि उन्हें डरकर काम करना पड़े तो वह इस्तीफा देना पसंद करेंगे।

पत्नी को जिंदा जलाने वाले नादिम को मौत की सजा

ये टिप्पणियां उस फैसले का हिस्सा हैं जिसमें अदालत ने नादिम नामक व्यक्ति को अपनी पत्नी शाहजादी को जिंदा जलाकर मारने के मामले में मौत की सजा सुनाई। अदालत ने अपराध की प्रकृति को बेहद क्रूर और बर्बर मानते हुए इसे ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ यानी विरलतम मामलों की श्रेणी में रखा। रिपोर्ट के अनुसार, नादिम ने 2018 में अपनी 23 वर्षीय पत्नी पर केरोसिन डालकर उसे आग के हवाले कर दिया था। मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या-3 के Additional District & Sessions Judge Ravi Kumar Diwakar ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। अदालत ने जुर्माना भी लगाया।

‘माफिया और अपराधियों को बचाने के लिए केस वापस लिए गए’

फैसले में जज दिवाकर ने कहा कि उनके कोर्ट से कुछ गंभीर मामलों की फाइलें वापस ली गईं। उन्होंने दावा किया कि ऐसा माफिया, गैंगस्टर और अपराधियों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया। जज ने कहा कि उन्हें इस पूरे मामले के पीछे की पूरी जानकारी है, लेकिन उन्होंने तत्काल सभी कारणों का खुलासा करना उचित नहीं समझा। उन्होंने इसके पीछे ‘पद की गरिमा’ का भी हवाला दिया। जज के मुताबिक, उन्हें यह संदेश भी मिला कि यदि उन्होंने इस मामले को आगे बढ़ाया या टिप्पणी की तो उच्च स्तर पर संपर्कों का इस्तेमाल कर उनका कोर्ट बदला जा सकता है या उन्हें जिले से बाहर स्थानांतरित किया जा सकता है। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के प्रभावशाली अपराधियों और बाहुबलियों के राजनीतिक तथा जातिगत संरक्षण और ऊंचे स्तर तक फैले नेटवर्क का भी उल्लेख किया।

‘मैं कायर जज कहलाने के बजाय मरना पसंद करूंगा’

जज रवि कुमार दिवाकर ने अपने फैसले में न्यायिक स्वतंत्रता को लेकर बेहद तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि उनके माता-पिता ने बचपन से उन्हें भगवान से डरना सिखाया, किसी इंसान से नहीं। उन्होंने कहा कि अगर कोई न्यायिक अधिकारी बाहुबलियों, माफिया या अपराधियों से डरने लगे तो यह उस भरोसे के खिलाफ होगा जो जनता न्यायपालिका से करती है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि वह ‘कायर जज’ कहलाने से बेहतर मौत को चुनेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक वह अपने सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं, तब तक सेवा में रहेंगे और यदि ऐसा संभव नहीं रहा तो इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न्यायिक कुर्सी पर रहते हुए किसी मामले में निर्णय लेने का अधिकार उन्हीं का होगा।

गंभीर मामलों की फाइलें वापस लेने पर मुख्य सचिव को भेजी जाएगी कॉपी

फैसले के अंत में जज ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को अपने निर्णय की प्रति भेजने का निर्देश दिया। उन्होंने कहा कि गंभीर Sessions मामलों में, जहां राज्य शिकायतकर्ता है और पीड़ित की ओर से अभियोजन चलाता है, यदि किसी कारण के बिना ऐसे मामलों की फाइलें एक अदालत से दूसरी अदालत में स्थानांतरित की जाती हैं और इससे अपराधियों, बाहुबलियों या आरोपियों को फायदा पहुंचने की आशंका हो, तो District Government Counsel (Criminal) को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।

जज के अनुसार, यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप जरूरी है, ताकि भविष्य में अपराधी, माफिया या बाहुबली अपनी पसंद की अदालत चुनने की स्थिति में न आ सकें।

97 गंभीर मामलों की फाइलें वापस लिए जाने की रिपोर्ट

 रिपोर्ट के अनुसार, जज दिवाकर की अदालत से हत्या और अन्य गंभीर अपराधों से जुड़े कुल 97 लंबित मामलों की फाइलें वापस ली गई थीं। रिपोर्ट में कहा गया है कि ये फाइलें District & Sessions Judge Birendra Kumar Singh के आदेश पर वापस ली गईं। यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब जज दिवाकर ने चार महीनों के भीतर 10 मामलों में 22 दोषियों को मौत की सजा सुनाई थी। हालांकि, फाइलें वापस लेने के प्रशासनिक कारण और जज द्वारा लगाए गए आरोपों के बीच संबंध को लेकर स्वतंत्र रूप से अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। जज ने स्वयं अपने फैसले में गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि उपलब्ध रिपोर्टों में संबंधित प्रशासनिक पक्ष का विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है।

कौन हैं जज रवि कुमार दिवाकर?

रवि कुमार दिवाकर वर्तमान में मुजफ्फरनगर में Additional District & Sessions Judge के रूप में तैनात हैं। वे नवंबर 2025 से मुजफ्फरनगर में पदस्थ हैं। इससे पहले 2022 में वाराणसी में सिविल जज के रूप में कार्य करते समय ज्ञानवापी परिसर के वीडियोग्राफिक सर्वे का आदेश देने के बाद वह राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आए थे। मार्च 2024 में भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को लेकर अपनी न्यायिक टिप्पणी के कारण वे सुर्खियों में रहे थे।

फैसला अभी अंतिम नहीं

नादिम को दी गई मौत की सजा का अंतिम क्रियान्वयन अपने आप नहीं हो सकता। Sessions Court द्वारा सुनाई गई death sentence को उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि किए जाने की कानूनी प्रक्रिया से गुजरना होता है। उपलब्ध रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट के पास सजा की पुष्टि करने, उसे कम करने या बदलने का अधिकार है। इस पूरे मामले ने एक तरफ पत्नी की निर्मम हत्या के लिए दी गई मौत की सजा को चर्चा में ला दिया है, तो दूसरी तरफ जज दिवाकर की टिप्पणियों ने न्यायिक स्वतंत्रता, केस ट्रांसफर और प्रभावशाली अपराधियों के संभावित दबाव जैसे गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।