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‘सर तन से जुदा’ नारा भारत की संप्रभुता को चुनौती, ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘जय श्री राम’ से तुलना नहीं: इलाहाबाद HC

‘सर तन से जुदा’ नारे पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है। बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा की जमानत खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि इस नारे की तुलना ‘अल्लाहु अकबर’, ‘जय श्री राम’ या ‘हर हर महादेव’ जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती। अदालत ने इसे कानून के शासन और भारत की संप्रभुता-अखंडता के लिए चुनौती बताया।

Sonali08 सित. 2026, 07:43 PM IST
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‘सर तन से जुदा’ नारा भारत की संप्रभुता को चुनौती, ‘अल्लाहु अकबर’ और ‘जय श्री राम’ से तुलना नहीं: इलाहाबाद HC

प्रयागराज: 

बरेली हिंसा मामले में मौलाना तौकीर रजा खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज करते हुए ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सर तन से जुदा’ जैसे नारे पर बेहद गंभीर टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इस तरह के नारे की तुलना ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’, ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’, ‘जय श्री राम’ या ‘हर हर महादेव’ जैसे धार्मिक नारों से नहीं की जा सकती। न्यायमूर्ति आशुतोष श्रीवास्तव की एकल पीठ ने 7 सितंबर 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि जहां अन्य धार्मिक नारे अपने-अपने भगवान या गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करते हैं, वहीं ‘सर तन से जुदा’ जैसा नारा कानून के अधिकार को चुनौती देने वाला है। कोर्ट ने इसे भारत की संप्रभुता और अखंडता के लिए चुनौती बताते हुए कहा कि ऐसा नारा लोगों को सशस्त्र विद्रोह के लिए उकसाने वाला हो सकता है और कानून के तहत दंडनीय है।


क्या है पूरा मामला?

मामला सितंबर 2025 में बरेली में हुई हिंसा से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार, ‘आई लव मोहम्मद’ अभियान से जुड़े मुद्दे को लेकर बड़ी संख्या में लोगों के एकत्र होने का आह्वान किया गया था। प्रशासन से अनुमति नहीं मिलने और BNSS की धारा 163 लागू होने के बावजूद लोग इस्लामिया मैदान की ओर बढ़े। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की, जिसके बाद हिंसा, पथराव और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं हुईं तथा पुलिसकर्मी भी घायल हुए। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह भी ध्यान दिया कि घटना के बाद तौकीर रजा ने ऐसा भाषण दिया जिसमें उन्होंने लोगों को उनके आह्वान पर प्रतिक्रिया देने के लिए धन्यवाद दिया और उनके कृत्यों की सराहना की। कोर्ट ने इस आचरण को भी स्वीकार्य नहीं माना।


पहले भी खारिज हो चुकी है जमानत

यह तौकीर रजा की जमानत से जुड़ी पहली हाईकोर्ट कार्यवाही नहीं थी। जून 2026 में भी इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज की थी। उस समय न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने आरोपों और उपलब्ध सामग्री को देखते हुए उन्हें राहत देने से इनकार किया था। मौजूदा आदेश में भी कोर्ट ने मामले की गंभीरता, हिंसा से जुड़े आरोपों और तौकीर रजा की कथित भूमिका को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया। रिपोर्टों के अनुसार, मामले में चार्जशीट 21 दिसंबर 2025 को दाखिल की जा चुकी है, जबकि आरोप अभी तय नहीं हुए हैं। इस फैसले के साथ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि धार्मिक अभिव्यक्ति और हिंसा अथवा कानून के शासन को चुनौती देने वाले नारों के बीच कानूनी अंतर किया जाएगा।