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‘पीड़िता ने कोर्ट में आरोपी की पहचान नहीं की’: 5 साल की बच्ची से रेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी

5 साल की बच्ची से रेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी ठहराए गए धनराज को बरी कर दिया। वजह बनी आरोपी की पहचान में अभियोजन की बड़ी चूक। बच्ची ने कहा था कि वह आरोपी को पहचान सकती है, लेकिन कोर्ट में उसकी पहचान नहीं कराई गई। SC ने साफ किया कि सिर्फ TIP में हुई पहचान substantive evidence नहीं होती।

Sonali08 सित. 2026, 07:43 PM IST
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‘पीड़िता ने कोर्ट में आरोपी की पहचान नहीं की’: 5 साल की बच्ची से रेप मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को किया बरी


नई दिल्ली:

 सुप्रीम कोर्ट ने 5 साल की बच्ची से बलात्कार के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे एक व्यक्ति को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि मुकदमे के दौरान पीड़ित बच्ची ने आरोपी धनराज की कोर्ट में पहचान नहीं की थी, जबकि वह अदालत में मौजूद था और बच्ची ने यह कहा था कि वह आरोपी को पहचान सकती है। न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने कहा कि इस मामले में आरोपी की पहचान को लेकर अभियोजन की कहानी में गंभीर कमी रह गई थी। खास तौर पर इसलिए क्योंकि आरोपी का नाम FIR में नहीं था और अभियोजन ने उसकी पहचान साबित करने के लिए मुख्य रूप से Test Identification Parade यानी TIP पर भरोसा किया था। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान कराई गई TIP में आरोपी की पहचान को अपने आप में substantive evidence यानी ठोस/मूल साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

TIP का मकसद क्या है?

सुप्रीम कोर्ट ने TIP की कानूनी स्थिति दोहराते हुए कहा कि इसका उद्देश्य किसी गवाह की याददाश्त और किसी ऐसे व्यक्ति को पहचानने की क्षमता को परखना है, जिसे उसने कथित घटना के दौरान देखा था। TIP जांच के दौरान गवाह की पहचान की क्षमता को टेस्ट करने और बाद में अदालत में की गई पहचान को corroborate यानी पुष्ट करने के लिए होती है। लेकिन TIP में की गई पहचान अपने आप में आरोपी की पहचान का substantive proof नहीं बन जाती। अदालत के अनुसार, वास्तविक substantive evidence तब सामने आता है जब गवाह अदालत में शपथ लेकर आरोपी की पहचान करता है। आम भाषा में इसे dock identification कहा जाता है।

बच्ची ने कहा था- आरोपी को पहचान सकती हूं

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पीड़ित बच्ची ने अपनी गवाही के दौरान यह बताया था कि वह आरोपी को पहचान सकती है। इसके बावजूद ट्रायल कोर्ट में उसकी गवाही के दौरान आरोपी की पहचान कराने की प्रक्रिया नहीं कराई गई। सुप्रीम कोर्ट ने इस चूक को बेहद महत्वपूर्ण माना। अदालत ने ट्रायल जज और सरकारी वकील की भूमिका पर भी सवाल उठाया और कहा कि जब आरोपी अदालत में मौजूद था और बच्ची ने उसे पहचानने की क्षमता की बात कही थी, तब अभियोजन को उसकी पहचान करानी चाहिए थी।

FIR में आरोपी का नाम भी नहीं था

सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। आरोपी धनराज का नाम घटना की FIR में नहीं था। इसके अलावा, पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया था कि पुलिस ने उसे आरोपी का नाम बताया था। ऐसी परिस्थितियों में अभियोजन के लिए अदालत में स्वतंत्र पहचान और भी महत्वपूर्ण हो जाती थी। लेकिन बच्ची से कोर्ट में आरोपी की पहचान नहीं कराई गई। अभियोजन ने मुख्य रूप से TIP के परिणाम पर भरोसा किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की पहचान का पर्याप्त substantive evidence मानने से इनकार कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान होने वाली Test Identification Parade केवल corroborative value रखती है। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि गवाह उस व्यक्ति को पहचान सकता है या नहीं, जिसे उसने घटना के समय देखा होने का दावा किया है। लेकिन यदि बाद में अदालत में गवाह आरोपी की पहचान ही नहीं करता, तो केवल TIP के आधार पर दोषसिद्धि कायम रखना मुश्किल होगा, विशेषकर तब जब आरोपी का नाम FIR में भी नहीं था और पहचान से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण सवाल मौजूद हों।

अभियोजन की लापरवाही पर कोर्ट सख्त

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि ट्रायल के दौरान मौजूद ट्रायल जज और सरकारी वकील ने बच्ची की गवाही के समय आरोपी की पहचान कराने की जरूरी प्रक्रिया नहीं अपनाई। अदालत के अनुसार, यह कोई मामूली तकनीकी कमी नहीं थी। मामले में आरोपी की पहचान ही अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा थी। जब पीड़िता आरोपी को पहचानने में सक्षम होने की बात कह रही थी और आरोपी अदालत में मौजूद था, तब उसकी पहचान रिकॉर्ड पर कराना आवश्यक था।

आरोपी हुआ बरी

इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन के मामले को आरोपी की पहचान के संबंध में गंभीर रूप से कमजोर पाया और धनराज को बलात्कार के मामले में दी गई दोषसिद्धि से बरी कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह फैसला घटना की गंभीरता को कम करके नहीं बल्कि आपराधिक मुकदमे में पहचान साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी मानकों को ध्यान में रखते हुए दिया। इस फैसले का महत्वपूर्ण कानूनी संदेश यह है कि किसी आरोपी की पहचान के लिए केवल TIP पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। यदि गवाह अदालत में आरोपी की पहचान करता है, तभी उस पहचान को substantive evidence के रूप में देखा जाता है।

कब और किसने दिया फैसला?

सुप्रीम कोर्ट की यह व्यवस्था 8 सितंबर 2026 को न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने दी। अदालत ने 5 साल की बच्ची से बलात्कार के मामले में दोषसिद्ध व्यक्ति धनराज को बरी किया। फैसला मुख्य रूप से आरोपी की पहचान से जुड़ी अभियोजन की गंभीर कमी और कोर्ट में पीड़िता द्वारा आरोपी की पहचान नहीं किए जाने पर आधारित था।