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14 साल पुराने अवैध निर्माण मामले में बिल्डर बरी, गवाहों को कोर्ट में नहीं ला सकी पुलिस; कल्याण कोर्ट का फैसला
डोंबिवली में बिना अनुमति 4 मंजिला इमारत बनाने के आरोप में दर्ज 14 साल पुराने मामले में कल्याण कोर्ट ने डेवलपर को बरी कर दिया। कोर्ट में अभियोजन पक्ष न तो शिकायतकर्ता और न ही स्वतंत्र गवाह, पंच या जांच अधिकारी को पेश कर सका। बार-बार समन जारी होने के बावजूद गवाह कोर्ट नहीं पहुंचे और आखिरकार केवल समन तामील कराने वाले पुलिसकर्मी की गवाही रिकॉर्ड हुई। पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर कोर्ट ने 4 सितंबर 2026 को आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।

यह मामला डोंबिवली पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक II-49/2011 और नियमित फौजदारी खटला क्र. 33/2012 से जुड़ा है। आरोपी की पहचान 63 वर्षीय डेवलपर कृष्णा कचरू पाटील के रूप में हुई। अभियोजन के अनुसार, 20 अक्टूबर 2011 को कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका के ग प्रभाग क्षेत्र अधिकारी श्रीधर गंगाराम थल्ला ने आरोपी के खिलाफ पुलिस में शिकायत की थी। आरोप था कि डोंबिवली ईस्ट के म्हात्रे नगर में कचरू भवन बिल्डिंग नंबर 3 के सामने आरोपी ने महानगरपालिका की आवश्यक अनुमति लिए बिना अवैध निर्माण कराया। अभियोजन के मुताबिक यह निर्माण ग्राउंड फ्लोर के अलावा तीन मंजिल का था और इसमें कुल 15 कमरे थे। महानगरपालिका की ओर से इसे महाराष्ट्र प्रादेशिक नियोजन व नगररचना अधिनियम, 1966 का उल्लंघन बताते हुए पुलिस में शिकायत दी गई। इसके बाद आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।
किन धाराओं में दर्ज हुआ केस?
आरोपी के खिलाफ महाराष्ट्र प्रादेशिक नियोजन व नगररचना अधिनियम, 1966 की धारा 52 के साथ धारा 53 और 54 के तहत आरोप लगाए गए थे। पुलिस ने जांच के दौरान घटनास्थल का पंचनामा तैयार करने, शिकायतकर्ता और गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। 17 जनवरी 2012 को मामला कोर्ट में दर्ज हुआ। हालांकि, आरोप तय होने में काफी समय लगा और कोर्ट ने 25 जनवरी 2024 को आरोपी के खिलाफ आरोप तय किए। इसके बाद 13 मार्च 2024 से साक्ष्य की कार्यवाही शुरू हुई।
कोर्ट में क्यों नहीं साबित हो सका मामला?
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष के लिए सबसे बड़ी समस्या गवाहों की गैरहाजिरी रही। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी को गवाही के लिए बार-बार समन जारी किए गए, लेकिन वे कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। गवाहों को दिए गए पतों पर समन की तामील कराने के लिए पुलिसकर्मी हरिदास मोहन गरड को कोर्ट में पेश किया गया। उन्होंने बताया कि वह अक्टूबर 2024 से डोंबिवली पुलिस स्टेशन में समन तामील कराने का काम कर रहे हैं और इस मामले के शिकायतकर्ता तथा अन्य गवाह दिए गए पते पर नहीं मिले। उन्होंने इस संबंध में अपनी रिपोर्ट भी कोर्ट में पेश की।
सिर्फ समन तामील कराने वाले पुलिसकर्मी की गवाही
मामले में अभियोजन पक्ष की ओर से केवल एक गवाह की जांच हुई। यह गवाह घटना का प्रत्यक्षदर्शी या शिकायतकर्ता नहीं था, बल्कि समन/वारंट तामील कराने वाला पुलिस अधिकारी था। इस कारण आरोपी द्वारा बिना अनुमति अवैध निर्माण किए जाने के आरोप को साबित करने के लिए कोर्ट के सामने प्रत्यक्ष साक्ष्य उपलब्ध नहीं हो सका। कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर ऐसा पर्याप्त सबूत नहीं है, जिससे आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित किए जा सकें।
4 सितंबर 2026 को आरोपी बरी
कल्याण के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम वर्ग, कोर्ट नंबर 3 के पीठासीन अधिकारी निलेश प्रभाकर वासाडे ने 4 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी ने बिना आवश्यक अनुमति के उक्त अवैध निर्माण किया था या संबंधित प्रावधानों के तहत नोटिस के बावजूद निर्माण को पूर्व स्थिति में लाने के आदेश का उल्लंघन किया। अदालत ने आरोपी कृष्णा कचरू पाटील को महाराष्ट्र प्रादेशिक नियोजन व नगररचना अधिनियम, 1966 की धारा 52 के साथ धारा 53 और 54 के तहत लगाए गए आरोपों से CrPC की धारा 248(1) के तहत बरी कर दिया। कोर्ट ने आरोपी और जमानतदारों के बंधपत्र रद्द कर दिए। साथ ही, ऊपरी अदालत में अपील होने की स्थिति में उपस्थित रहने के लिए CrPC की धारा 437-A के तहत जमानत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। इस तरह 2011 में दर्ज हुआ यह मामला करीब 14 साल 7 महीने बाद आरोपी की दोषमुक्ति के साथ समाप्त हुआ।
