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पुलिस की क्लीन चिट के बाद भी आरोपी को बुला सकता है कोर्ट, केस डायरी में अपराध का प्रथम दृष्टया आधार हो तो मजिस्ट्रेट को अधिकार: इलाहाबाद HC
पुलिस की फाइनल रिपोर्ट से आरोपी को राहत मिलना तय नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि केस डायरी में प्रथम दृष्टया अपराध के सबूत हों तो मजिस्ट्रेट फाइनल रिपोर्ट खारिज कर आरोपी को समन कर सकता है।

प्रयागराज:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पुलिस जांच के बाद किसी मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर देती है और पुलिस की राय होती है कि आरोपी के खिलाफ कोई मामला नहीं बनता, तब भी मजिस्ट्रेट उस रिपोर्ट से बंधा नहीं है। यदि केस डायरी में अपराध के प्रथम दृष्टया पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं, तो मजिस्ट्रेट धारा 190(1)(b) CrPC के तहत संज्ञान लेकर आरोपी को समन कर सकता है। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट के लिए धारा 200 और 202 CrPC में निर्धारित शिकायत संबंधी प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य नहीं है। यह फैसला जस्टिस संदीप जैन ने Jeetu Soni v. State of U.P. and 2 Others मामले में सुनाया। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसके तहत पुलिस की फाइनल रिपोर्ट को अस्वीकार करते हुए आरोपियों को मुकदमे का सामना करने के लिए समन किया गया था।
क्या है पूरा मामला?
मामला वर्ष 2015 का है। शिकायतकर्ता जीतू सोनी ने 18 मार्च 2015 को औरैया जिले के बिधूना थाने में IPC की धारा 307 के तहत FIR दर्ज कराई थी। आरोप था कि वह अपने पिता और भाइयों के साथ ज्वेलरी की दुकान से घर लौट रहा था। इसी दौरान सतेंद्र उर्फ चुनमुन और नारायण लाल रंग की पल्सर मोटरसाइकिल से पहुंचे और पुरानी रंजिश के चलते उसके भाई अनिल सोनी पर गोली चला दी। घटना के दिन ही घायल अनिल का मेडिकल परीक्षण हुआ, जिसमें गोली से लगी चोट की पुष्टि हुई। घायल और शिकायतकर्ता के धारा 161 CrPC के तहत दर्ज बयानों में दोनों आरोपियों के नाम सामने आए। इसके बावजूद जांच अधिकारी ने मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी। इसके खिलाफ शिकायतकर्ता ने प्रोटेस्ट पिटीशन दाखिल की।
मजिस्ट्रेट ने फाइनल रिपोर्ट क्यों खारिज की?
10 जनवरी 2019 को न्यायिक मजिस्ट्रेट, औरैया ने प्रोटेस्ट पिटीशन स्वीकार करते हुए धारा 190(1)(b) CrPC के तहत संज्ञान लिया और आरोपियों को समन जारी कर दिया। हालांकि, आरोपियों ने इसके खिलाफ पुनरीक्षण याचिका दायर की। 15 जुलाई 2019 को सत्र न्यायालय ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा विचार के लिए भेज दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
हाईकोर्ट ने कहा कि संज्ञान लेने और समन जारी करने के चरण में मजिस्ट्रेट को केवल यह देखना होता है कि रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं। इस स्तर पर आरोपी का बचाव, उसके पक्ष की सामग्री या मामले के गुण-दोष का विस्तृत परीक्षण करने की जरूरत नहीं होती। कोर्ट ने केस डायरी में मौजूद मेडिकल रिपोर्ट, घायल के बयान और शिकायतकर्ता के बयान समेत अन्य सामग्री पर गौर किया। कोर्ट के अनुसार इन सामग्रियों से IPC की धारा 307 के तहत प्रथम दृष्टया अपराध सामने आता था। हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की अंतिम राय मजिस्ट्रेट के लिए बाध्यकारी नहीं है। वह जांच के दौरान सामने आई सामग्री के आधार पर स्वतंत्र रूप से अपना न्यायिक विवेक इस्तेमाल कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट के Rakesh, Vishnu Kumar Tiwari, Sonu Gupta और State of Gujarat v. Afroz Mohammed Hasanfatta जैसे फैसलों का भी हवाला दिया गया। अदालत ने सत्र न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा जारी समन को बरकरार रखा और याचिका स्वीकार कर ली।
