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घर का ताला टूटा, सोने के गहने और कैश गायब... फिर कोर्ट में पलट गई कहानी, 8 साल पुराने चोरी केस में आरोपी बरी

डोंबिवली के करीब 8 साल पुराने चोरी के मामले में कल्याण कोर्ट ने आरोपी को बरी कर दिया। पंच गवाह की कमजोर गवाही और अहम गवाहों के कोर्ट में पेश न होने से अभियोजन आरोप साबित नहीं कर सका।

Sonali09 सित. 2026, 06:38 PM IST
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घर का ताला टूटा, सोने के गहने और कैश गायब... फिर कोर्ट में पलट गई कहानी, 8 साल पुराने चोरी केस में आरोपी बरी

कल्याण:

 घर का ताला तोड़कर सोने के गहने और 15 हजार रुपये नकद चोरी करने के आरोप में चल रहे करीब 8 साल पुराने मामले में कल्याण की अदालत ने आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ चोरी और घर में अनधिकृत प्रवेश के आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा। मामले में पंच गवाह ने ही पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े कर दिए और कहा कि पंचनामा उसके सामने तैयार नहीं किया गया था।


क्या था पूरा मामला?

यह मामला डोंबिवली पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध क्रमांक 95/2018 से जुड़ा था। अभियोजन के अनुसार 16 मार्च 2018 को शिकायतकर्ता सरिता रेवत गदाल दोपहर करीब 2 बजे अपने घर पर ताला लगाकर बाहर गई थीं। शाम करीब 6 बजे जब वह वापस लौटीं तो घर के दरवाजे पर लगा ताला गायब था घर के अंदर जाने पर सामान अस्त-व्यस्त मिला। जांच करने पर कपाट से सोने की चेन, झुमके और 15 हजार रुपये नकद गायब मिले। इसके बाद शिकायतकर्ता ने डोंबिवली पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई।


पुलिस ने आरोपी के खिलाफ दर्ज किया केस

शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपी लक्ष्मण सुरेश शिवशरण के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 454 और 380 के तहत मामला दर्ज किया। पुलिस ने जांच के दौरान आरोपी को गिरफ्तार किया, पंचनामा तैयार किया, गवाहों के बयान दर्ज किए और कथित तौर पर आवश्यक दस्तावेज व मुद्देमाल अपने कब्जे में लिया। जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने 16 नवंबर 2018 को आरोपी के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। बाद में कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 454 और 380 के तहत आरोप तय किए। आरोपी ने आरोपों से इनकार करते हुए मुकदमा चलाने की मांग की।


कोर्ट में सिर्फ दो गवाहों की गवाही

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने मुख्य रूप से दो गवाहों की जांच की। इनमें पंच गवाह अशोक रामचंद्र गायकवाड और समन्स/वारंट बजावणी अधिकारी संतोष सुभाष ठाकुर शामिल थे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि पंच गवाह अशोक गायकवाड ने अदालत में कहा कि पुलिस ने उनसे एक कागज पर हस्ताक्षर करवाए थे, लेकिन उस कागज में क्या लिखा था, इसकी उन्हें जानकारी नहीं थी। उन्होंने पंचनामे पर अपनी हस्ताक्षर की पहचान तो की, लेकिन पंचनामे की सामग्री से अनभिज्ञता जताई। उलटतपास में पंच गवाह ने यह भी स्वीकार किया कि पंचनामा उनके सामने तैयार नहीं किया गया था। इससे अभियोजन पक्ष के मामले को बड़ा झटका लगा।


अन्य गवाह कोर्ट में नहीं पहुंचे

अभियोजन पक्ष ने अन्य गवाहों को अदालत में पेश करने के लिए कई बार समन्स बजावले। हालांकि, वे गवाह कोर्ट में उपस्थित नहीं हुए। बजावणी अधिकारी ने अदालत को बताया कि शिकायतकर्ता वर्तमान में दुबई में नौकरी करीत असल्याने साक्षीसाठी उपस्थित राहू शकत नाही. कुछ अन्य गवाहों के निधन की जानकारी मिली, जबकि बाकी गवाह उनके दिए पते पर नहीं मिले। कोर्ट ने कहा कि 2019 से प्रलंबित मामले में गवाह भविष्य में निश्चित रूप से उपस्थित होतील, अशी खात्री देता येत नाही. केवल गवाहों के आने की प्रतीक्षा में मुकदमा अनिश्चित काल तक लंबित रखना उचित नहीं है।


अभियोजन पक्ष आरोप साबित नहीं कर सका

कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों का विश्लेषण करने के बाद कहा कि आरोपी के खिलाफ कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं आया। महत्वपूर्ण गवाहों के अदालत में उपस्थित नहीं होने और पंच गवाह की गवाही से अभियोजन पक्ष की कहानी को आवश्यक समर्थन नहीं मिला। अदालत ने माना कि आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 454 और 380 के अपराध के आवश्यक तत्व संदेह से परे साबित नहीं हुए हैं। आपराधिक मामले में अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी आरोपी के खिलाफ आरोप को उचित संदेह से परे साबित करने की होती है। उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह जिम्मेदारी पूरी नहीं हुई।


8 सितंबर 2026 को सुनाया फैसला

कल्याण के प्रथमवर्ग न्यायदंडाधिकारी, छठे न्यायालय की पीठासीन अधिकारी श्रीमती के.एस. कातकाडे ने 8 सितंबर 2026 को अपना फैसला सुनाया। अदालत ने आरोपी लक्ष्मण सुरेश शिवशरण को फौजदारी प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत IPC की धारा 454 और 380 के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने आरोपी और जमानतदार के बंधपत्र रद्द कर दिए। साथ ही, अपील की स्थिति में वरिष्ठ अदालत के समक्ष उपस्थित रहने के लिए CrPC की धारा 437-A के तहत आवश्यक बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया।


पहले ही लौटाया जा चुका था जब्त मुद्देमाल

फैसले में अदालत ने यह भी दर्ज किया कि मामले में जब्त किया गया मुद्देमाल पहले ही 6 जनवरी 2020 को कोर्ट के आदेश के जरिए मूल शिकायतकर्ता को वापस किया जा चुका है। अदालत ने निर्देश दिया कि अपील की अवधि समाप्त होने के बाद संबंधित आदेश को कायम रखा जाए।


कोर्ट का स्पष्ट संदेश

इस मामले में अदालत के फैसले का मूल आधार यह रहा कि केवल FIR या आरोपपत्र दाखिल हो जाने से आरोपी के खिलाफ अपराध साबित नहीं हो जाता। अभियोजन पक्ष को अदालत के सामने भरोसेमंद मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों के जरिए आरोप सिद्ध करने होते हैं। यहां महत्वपूर्ण गवाहों की अनुपस्थिति और पंच गवाह की प्रतिकूल गवाही के कारण अभियोजन का मामला कमजोर पड़ गया और अंततः आरोपी को बरी कर दिया गया।