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₹72,691 की शराब जब्ती के मामले में आरोपी बरी, कल्याण कोर्ट ने कहा- केमिकल रिपोर्ट के बिना शराब साबित नहीं

ढाबे पर ₹72,691 की शराब मिलने के बावजूद आरोपी को कोर्ट से राहत मिल गई। मामला अवैध शराब रखने और बेचने का था, लेकिन कल्याण कोर्ट में अभियोजन जप्त शराब को रासायनिक जांच रिपोर्ट से साबित नहीं कर सका। रिपोर्ट और सैंपल ले जाने वाले व्यक्ति की गवाही रिकॉर्ड पर न होने के कारण कोर्ट ने 7 सितंबर 2026 को आरोपी को बरी कर दिया।

Sonali09 सित. 2026, 06:38 PM IST
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₹72,691 की शराब जब्ती के मामले में आरोपी बरी, कल्याण कोर्ट ने कहा- केमिकल रिपोर्ट के बिना शराब साबित नहीं

यह मामला महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम, 1949 की धारा 65(ई) के तहत दर्ज किया गया था। आरोपी की पहचान सुनिलकुमार रामजेवन राम, उम्र 32 वर्ष के रूप में हुई है। मामला राज्य आबकारी विभाग की भरारी पथक क्र. 2, ठाणे से संबंधित था। अभियोजन के अनुसार, 14 अप्रैल 2025 को साई ढाबा, मुंबई-नाशिक रोड हाईवे, भिवंडी बायपास के पास वडपा में अवैध शराब बिक्री की सूचना मिली थी। सूचना के आधार पर आबकारी विभाग की टीम पंचों और कर्मचारियों के साथ मौके पर पहुंची। अभियोजन का दावा था कि आरोपी ढाबे के काउंटर पर शराब बेचते हुए मिला। तलाशी के दौरान टीम ने अलग-अलग ब्रांड की देशी-विदेशी शराब और बीयर बरामद की, जिसकी कुल कीमत ₹72,691 बताई गई। मौके से जब्त शराब में बकार्डी व्हिस्की, मैकडॉवेल व्हिस्की, रॉयल चैलेंज व्हिस्की, ब्लेंडर्स प्राइड समेत अन्य शराब और बीयर शामिल होने का दावा किया गया। जप्त शराब में से दो 180 मिलीलीटर की बोतलों में नमूने लेकर उन्हें सीलबंद किया गया और जप्ती पंचनामा तैयार किया गया। इसके बाद जवान आर.एम. राठोड की शिकायत पर आरोपी के खिलाफ अपराध क्रमांक I-182/2025 दर्ज किया गया और महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम की धारा 65(ई) के तहत मामला दर्ज हुआ।

कोर्ट में अभियोजन ने क्या सबूत दिए?

मामले की सुनवाई कल्याण के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम वर्ग, न्यायालय क्रमांक 3 में हुई। अभियोजन की ओर से सहायक सरकारी अभियोक्ता ए.पी. आडसकर और आरोपी की ओर से अधिवक्ता के.डी. धिवरे ने पक्ष रखा। अभियोजन की ओर से मुख्य रूप से जांच अधिकारी तेवीचंद चरणदास चव्हाण की गवाही कराई गई। उनके जरिए जप्ती पंचनामा, शिकायत और FIR जैसे दस्तावेज रिकॉर्ड पर पेश किए गए। जांच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि 14 अप्रैल 2025 को सूचना मिलने के बाद टीम साई ढाबे पर पहुंची थी और आरोपी को शराब बेचते हुए पाया गया था। इसके बाद शराब जब्त कर नमूने सीलबंद किए गए और उन्हें रासायनिक जांच के लिए भेजा गया।

केमिकल रिपोर्ट बनी सबसे बड़ी कमी

कोर्ट ने मामले में अभियोजन के सबूतों का परीक्षण करते हुए पाया कि रिकॉर्ड पर जप्त शराब की रासायनिक जांच रिपोर्ट मौजूद ही नहीं थी। कोर्ट ने कहा कि जब जप्त किए गए पदार्थ की रासायनिक जांच रिपोर्ट रिकॉर्ड पर नहीं है, तो यह साबित नहीं होता कि जप्त किया गया पदार्थ वास्तव में शराब ही था। इसके अलावा, जिन व्यक्तियों के माध्यम से सीलबंद बोतलों को रासायनिक जांच के लिए भेजा गया था, उनकी भी गवाही कोर्ट के सामने नहीं लाई गई। यही कमी अभियोजन के मामले के लिए महत्वपूर्ण साबित हुई। कोर्ट ने माना कि केवल जांच अधिकारी की गवाही के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि जप्त पदार्थ शराब था और आरोपी उसके अवैध कब्जे में उसे बेच रहा था।

आरोपी को क्यों किया गया बरी?

आरोपी ने कोर्ट में अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया और कहा कि अभियोजन की पूरी कहानी झूठी है। मामले में अभियोजन आवश्यक संदेह से परे आरोप साबित नहीं कर सका। कल्याण कोर्ट के पीठासीन अधिकारी श्री निलेश प्रभाकर वासाडे ने 7 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए आरोपी सुनिलकुमार रामजेवन राम को महाराष्ट्र दारूबंदी अधिनियम की धारा 65(ई) के आरोप से बरी कर दिया। कोर्ट ने आरोपी और जमानतदार के बंधपत्र रद्द कर दिए। आरोपी द्वारा पहले जमा की गई ₹7,500 की नकद जमानत राशि को छह महीने के लिए बरकरार रखा गया और धारा 437-A के तहत ₹15,000 का जमानती मुचलका प्रस्तुत करने का आदेश दिया गया। जप्त मुद्देमाल के संबंध में कोर्ट ने राज्य आबकारी विभाग को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नियमानुसार कार्रवाई करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट का मुख्य निष्कर्ष यह रहा कि अभियोजन जप्त पदार्थ को शराब साबित करने के लिए जरूरी वैज्ञानिक साक्ष्य रिकॉर्ड पर नहीं ला सका। रासायनिक जांच रिपोर्ट के अभाव और नमूने जांच के लिए ले जाने वाले व्यक्ति की गवाही न होने के कारण आरोपी के खिलाफ लगाया गया आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुआ। इस आधार पर कोर्ट ने आरोपी को दोषमुक्त कर दिया।