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15 साल पुराने जबरन वसूली और मारपीट केस में 5 आरोपी बरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और जांच में खामियों पर कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ

15 साल पुराने जबरन वसूली और मारपीट के मामले में कल्याण कोर्ट ने पांच आरोपियों को बरी कर दिया। आरोप था कि निर्माण स्थल पर 50 हजार रुपये की मांग कर मारपीट की गई, लेकिन गवाहों के विरोधाभासी बयानों, आरोपियों की पहचान साबित न होने और जांच की कमियों के चलते अभियोजन आरोप साबित नहीं कर सका।

Sonali09 सित. 2026, 06:38 PM IST
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15 साल पुराने जबरन वसूली और मारपीट केस में 5 आरोपी बरी, गवाहों के बयानों में विरोधाभास और जांच में खामियों पर कोर्ट ने दिया संदेह का लाभ

क्या था पूरा मामला?

मामला Manpada Police Station के FIR No. 321/2009 से जुड़ा है। घटना 7 सितंबर 2009 की बताई गई है और FIR 8 सितंबर 2009 को दर्ज हुई थी। मामले में राजाराम बाबूराव पाटिल, सोमनाथ हरिश्चंद्र पाटिल, जगदीश हरिश्चंद्र भोईर, प्रेमनाथ हरिश्चंद्र भोईर और प्रल्हाद हरिश्चंद्र भोईर को आरोपी बनाया गया था। अभियोजन के मुताबिक, शिकायतकर्ता सोनुभाई उर्फ श्रावणदास तेजाराम वैष्णव निर्माण कार्य से जुड़े थे। डोंबिवली के मनपाड़ा रोड स्थित सर्वे नंबर 34/1 की जमीन पर निर्माण कार्य चल रहा था। जमीन के मालिक बाबू धर्मा पाटिल के बेटे यानी आरोपी नंबर-1 की ओर से जमीन निर्माण के लिए कुछ लोगों को दी गई थी। निर्माण कार्य को लेकर विवाद के बाद पहले काम कर रहे लोगों ने निर्माण छोड़ दिया और बाद में यह काम शिकायतकर्ता को मिला। आरोप था कि 7 सितंबर 2009 को निर्माण स्थल पर आरोपी पहुंचे और शिकायतकर्ता से 50 हजार रुपये की मांग की। अभियोजन के अनुसार आरोपियों ने शिकायतकर्ता और अन्य लोगों के साथ मारपीट की तथा बांस की लाठी समेत अन्य हथियारों का इस्तेमाल किया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने Manpada Police Station में रिपोर्ट दर्ज कराई।


पुलिस ने दर्ज की FIR, चार्जशीट दाखिल

शिकायत के आधार पर पुलिस ने FIR No. 321/2009 दर्ज की। जांच अधिकारी API वी.के. कांबली ने घटनास्थल का पंचनामा तैयार करने, गवाहों के बयान दर्ज करने, आरोपियों को गिरफ्तार करने और निर्माण से जुड़े दस्तावेज हासिल करने की कार्रवाई की। इसके बाद 20 जनवरी 2010 को आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई।

आरोपियों पर IPC की धारा 143, 147, 148, 385, 352, 504, 506 और 427 के साथ धारा 149 के तहत आरोप लगाए गए। 7 अप्रैल 2012 को आरोप तय किए गए। सभी आरोपियों ने खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे का सामना करने की बात कही।


गवाहों की गवाही में सामने आई बड़ी विसंगति

मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन की ओर से तीन गवाह पेश किए गए। शिकायतकर्ता सोनुभाई वैष्णव, उनके भाई घनश्यामदास वैष्णव और एक अन्य गवाह भगवती किसनलाल रखारा ने अदालत में बयान दिए। शिकायतकर्ता ने बताया कि आरोपी उनके कार्यालय में आए और पैसे की मांग करते हुए उन्हें धक्का दिया। वहीं उनके भाई ने बयान दिया कि आरोपी निर्माण स्थल पर आए थे और वहां शिकायतकर्ता को बांस की लाठी से पीटा तथा उनके साथ भी मारपीट की। कोर्ट ने दोनों बयानों में घटनास्थल को लेकर स्पष्ट विरोधाभास पाया। एक गवाह के मुताबिक घटना कार्यालय में हुई, जबकि दूसरे के अनुसार मारपीट निर्माण स्थल पर हुई थी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि बांस की लाठी से मारपीट किए जाने की बात शिकायतकर्ता के अपने बयान में सामने नहीं आई थी।


एक गवाह आरोपियों को पहचान भी नहीं सका

अदालत ने पाया कि तीसरे गवाह ने घटना के संबंध में कुछ लोगों के निर्माण स्थल पर आकर विवाद करने की बात कही, लेकिन वह आरोपियों की पहचान नहीं कर सका। कोर्ट ने यह भी कहा कि कथित मारपीट के संबंध में कोई injury report रिकॉर्ड पर नहीं थी। इसके अलावा अभियोजन पक्ष घटनास्थल के पंचनामा और कथित हथियार की जब्ती को भी साबित नहीं कर सका।


50 हजार रुपये की मांग का आरोप भी साबित नहीं हुआ

आरोपियों पर IPC की धारा 385 के तहत जबरन वसूली के लिए डर पैदा करने का आरोप था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं आया जिससे यह साबित हो सके कि शिकायतकर्ता ने जान के डर से आरोपियों को पैसे दिए थे। अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में भी असफल रहा कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता को डराकर उससे जबरन वसूली करने के उद्देश्य से कोई रकम हासिल की या ऐसा करने का प्रयास किया।


जांच अधिकारी भी कोर्ट में नहीं पहुंचे

फैसले में जांच प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण बात सामने आई। अदालत ने नोट किया कि मामले के जांच अधिकारी कोर्ट में गवाही देने के लिए उपस्थित नहीं हुए। इसके अलावा घटनास्थल का पंचनामा और हथियार की जब्ती भी अभियोजन की ओर से विधिवत साबित नहीं की गई। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन की कहानी कई स्तरों पर संदेह पैदा करती है। आरोपियों के खिलाफ गैरकानूनी जमावड़ा, दंगा, हथियार रखने, जबरन वसूली, मारपीट, गाली-गलौज, धमकी और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने के आरोप संदेह से परे साबित नहीं हो सके।


कल्याण कोर्ट ने सभी पांचों को किया बरी

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास, तीसरी अदालत, कल्याण के न्यायिक अधिकारी निलेश प्रभाकर वसाडे ने 7 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया। कोर्ट ने राजाराम बाबूराव पाटिल, सोमनाथ हरिश्चंद्र पाटिल, जगदीश हरिश्चंद्र भोईर, प्रेमनाथ हरिश्चंद्र भोईर और प्रल्हाद हरिश्चंद्र भोईर को IPC की धारा 143, 147, 148, 385, 352, 504, 506 और 427 के साथ धारा 149 के तहत लगे आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने सभी आरोपियों के जमानत बांड रद्द कर उनके जमानतदारों को मुक्त कर दिया। हालांकि CrPC की धारा 437-A के अनुपालन के लिए प्रत्येक आरोपी को 15 हजार रुपये का पर्सनल और श्योरिटी बॉन्ड जमा करने का निर्देश दिया गया।


15 साल बाद आया फैसला

यह मामला 20 जनवरी 2010 को रजिस्टर्ड हुआ था और करीब 16 साल से अधिक समय तक अदालत में लंबित रहा। आखिरकार 7 सितंबर 2026 को फैसला सुनाया गया। कोर्ट ने अभियोजन के सबूतों में मौजूद विरोधाभासों और जांच संबंधी कमियों को देखते हुए सभी पांच आरोपियों को संदेह का लाभ दिया। कोर्ट ने मामले में जब्त तीन लकड़ी की बांस की लाठियों को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नष्ट करने का भी आदेश दिया है।