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17 साल की नाबालिग से रेप और POCSO के आरोप, 23 वर्षीय युवक बरी; कोर्ट ने कहा- पीड़िता ने खुद यौन उत्पीड़न से किया इनकार

17 साल की नाबालिग से रेप और POCSO के गंभीर आरोपों वाले मामले में कल्याण की विशेष अदालत ने 23 वर्षीय आरोपी को बरी कर दिया। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल के दौरान पीड़िता ने खुद यौन उत्पीड़न के आरोपों का समर्थन नहीं किया, जबकि मेडिकल और फोरेंसिक साक्ष्य भी अभियोजन के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

Sonali09 सित. 2026, 06:38 PM IST
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17 साल की नाबालिग से रेप और POCSO के आरोप, 23 वर्षीय युवक बरी; कोर्ट ने कहा- पीड़िता ने खुद यौन उत्पीड़न से किया इनकार

कल्याण में 17 वर्षीय नाबालिग से रेप और POCSO एक्ट के तहत दर्ज मामले में आरोपी 23 वर्षीय निखिल वसंत लालगे को अदालत ने बरी कर दिया है। अभियोजन ने आरोपी पर शादी का भरोसा देकर नाबालिग से बार-बार यौन संबंध बनाने, वीडियो-फोटो के जरिए धमकाने और गर्भपात के लिए गोलियां देने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन ट्रायल के दौरान पीड़िता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। उसने अदालत में कहा कि शिकायत उसने गुस्से और आपसी छोटे-मोटे विवादों के चलते दर्ज कराई थी। कल्याण के Special Judge (POCSO) लक्ष्मीकांत ए. बिडवाई ने 8 सितंबर 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

क्या था पूरा मामला?

मामला उल्हासनगर पुलिस स्टेशन का है। Crime No. 281/2024 में आरोपी के खिलाफ IPC की धारा 376, 376(2)(n), 504, 506 और POCSO Act की धारा 4, 6, 8, 10 और 12 के तहत आरोप लगाए गए थे। अभियोजन के मुताबिक, पीड़िता और आरोपी एक ही इलाके में रहते थे। दोनों के बीच पहले दोस्ती हुई और WhatsApp तथा Instagram पर बातचीत के बाद यह रिश्ता प्रेम संबंध में बदल गया। आरोप था कि आरोपी ने पीड़िता को भरोसा दिया कि 18 साल की होने के बाद वह उससे शादी करेगा। अभियोजन की कहानी के अनुसार, सितंबर 2022 से फरवरी 2024 के बीच आरोपी ने शादी का भरोसा देकर पीड़िता के साथ अलग-अलग स्थानों पर यौन संबंध बनाए। आरोपों में दत्तवाड़ी, गोपाल अस्पताल के पास, कोलीवाड़ी फार्म हाउस, भारत गैस गोदाम और गोवेली बस स्टॉप के पास का जिक्र किया गया था।

वीडियो-फोटो बनाकर धमकाने का भी आरोप

अभियोजन ने यह भी आरोप लगाया था कि 2021 में आरोपी पीड़िता को अपने दोस्त के फार्म हाउस पर ले गया था, जहां उसने कथित तौर पर उसका वीडियो और फोटो बनाए। इसके बाद इन्हें वायरल करने की धमकी देकर उससे बार-बार यौन संबंध बनाने का आरोप लगाया गया। इसके अलावा अभियोजन की कहानी में यह भी कहा गया कि पीड़िता आरोपी से गर्भवती हुई और आरोपी ने गर्भपात के लिए उसे गोलियां दीं, जिन्हें लेने के बाद गर्भावस्था समाप्त हो गई। आरोप यह भी था कि बाद में आरोपी ने पीड़िता से शादी करने से इनकार कर दिया और उसके कार्यस्थल पर जाकर उसके चरित्र को लेकर हंगामा किया। लगातार कथित प्रताड़ना के कारण पीड़िता द्वारा दो-तीन बार आत्महत्या का प्रयास किए जाने की बात भी अभियोजन ने कही थी।

19 फरवरी 2024 को दर्ज हुई FIR

घटना से संबंधित शिकायत 19 फरवरी 2024 को उल्हासनगर पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई और Crime No. 281/2024 दर्ज किया गया। जांच API प्रवीण घुटुगड़े को सौंपी गई।

जांच के दौरान पुलिस ने आठ गवाहों के बयान दर्ज किए, दो अलग-अलग स्थानों के पंचनामा तैयार किए और पीड़िता तथा आरोपी का मेडिकल परीक्षण कराया। इसके बाद पुलिस ने आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की। 17 अप्रैल 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई। अदालत ने 9 जुलाई 2026 को आरोप तय किए और 23 जुलाई 2026 से साक्ष्य दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हुई। 11 अगस्त 2026 को फैसला सुरक्षित रखा गया और 8 सितंबर 2026 को निर्णय सुनाया गया।

कोर्ट में पीड़िता ने क्या कहा?

मामले में अभियोजन की ओर से केवल पीड़िता को PW-1 के रूप में पेश किया गया। अदालत ने पाया कि उसकी गवाही अभियोजन की मूल कहानी के अनुरूप नहीं थी। पीड़िता ने माना कि आरोपी के साथ उसका प्रेम संबंध था और उनके बीच शारीरिक संबंध थे। लेकिन जब सरकारी वकील ने उसे शिकायत और CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयान के हिस्सों से confront किया, तो उसने शिकायत के महत्वपूर्ण हिस्सों को अपनी बात मानने से इनकार कर दिया। उसने यह भी कहा कि शिकायत में दर्ज बातें उसके अनुसार नहीं थीं।

बाद में दोनों ने कर ली शादी

ट्रायल के दौरान एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया। पीड़िता ने अदालत में स्वीकार किया कि 1 अप्रैल 2026 को उसकी और आरोपी की शादी हो चुकी है और यह प्रेम विवाह था। बचाव पक्ष की जिरह में पीड़िता ने स्पष्ट रूप से कहा कि शिकायत दर्ज कराने से पहले उनके बीच छोटे-मोटे विवाद और मतभेद हुए थे और उसने गुस्से में शिकायत दर्ज कराई थी। उसने यह भी कहा कि उसे किसी के खिलाफ शिकायत नहीं है।

मेडिकल रिपोर्ट भी अभियोजन के काम नहीं आई

अदालत ने आरोपी द्वारा पीड़िता की मेडिकल जांच से संबंधित रिपोर्ट को स्वीकार किए जाने का भी उल्लेख किया। हालांकि कोर्ट ने पाया कि मेडिकल रिपोर्ट में अंतिम राय मौजूद नहीं थी। अदालत के अनुसार, रिपोर्ट में फोरेंसिक जांच के लिए जैविक नमूने भी एकत्र किए जाने की बात नहीं थी। इसके अलावा पीड़िता और आरोपी के कपड़े भी फोरेंसिक जांच के लिए जब्त नहीं किए गए थे। इस वजह से अदालत ने मेडिकल रिपोर्ट को अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण corroborative evidence नहीं माना।

कोर्ट ने क्यों किया आरोपी को बरी?

Special Judge (POCSO) लक्ष्मीकांत ए. बिडवाई ने फैसले में कहा कि पीड़िता ने खुद आरोपी द्वारा किसी भी तरह के sexual assault से इनकार किया है। अदालत ने यह भी पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई मेडिकल साक्ष्य नहीं है, जिससे यौन हमला साबित हो सके। कोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि शिकायत और CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज पीड़िता का बयान भी विधिवत साबित नहीं किया गया। अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। इसलिए IPC की धारा 376, 376(2)(n), 504, 506 और POCSO Act की धाराओं 4, 6, 8, 10 और 12 के सभी आरोपों पर आरोपी के खिलाफ फैसला नकारात्मक रहा।

8 सितंबर को सुनाया गया फैसला

कल्याण के Sessions Court में Special Judge (POCSO) लक्ष्मीकांत ए. बिडवाई ने 8 सितंबर 2026 को आरोपी निखिल वसंत लालगे को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

अदालत ने आरोपी के bail bonds रद्द करते हुए sureties को discharge कर दिया। साथ ही BNSS की धारा 481 के अनुपालन के लिए आरोपी को 25,000 रुपये का personal bond और इतनी ही राशि की surety देने का निर्देश दिया। इस तरह करीब ढाई साल पुराने इस POCSO और रेप केस का अंत आरोपी की acquittal के साथ हुआ। अदालत का फैसला मुख्य रूप से पीड़िता के ट्रायल में अभियोजन की कहानी से पीछे हटने, आरोपों को साबित करने वाले पर्याप्त मेडिकल/फोरेंसिक साक्ष्य के अभाव और शिकायत व धारा 164 के बयान के विधिवत साबित न होने पर आधारित रहा।