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‘पवित्र पत्नी’ की सीख देने वाले फैमिली कोर्ट पर बॉम्बे HC सख्त, कहा- बच्चे का भविष्य रूढ़िवादी सोच से नहीं तय होगा

बच्चे की कस्टडी के मामले में मां की ‘पत्नी’ या ‘बहू’ के रूप में भूमिका को आधार बनाने पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट को कड़ी फटकार लगाई है। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी तय करते समय किसी महिला के वैवाहिक आचरण या कथित ‘पवित्र कर्तव्यों’ से ज्यादा जरूरी बच्चे का सर्वोत्तम हित है। अदालत ने फैमिली कोर्ट की ऐसी टिप्पणियों को प्रतिगामी और मामले से असंबंधित बताते हुए अंतरिम कस्टडी का आदेश रद्द कर दिया

Sonali10 सित. 2026, 06:51 PM IST
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‘पवित्र पत्नी’ की सीख देने वाले फैमिली कोर्ट पर बॉम्बे HC सख्त, कहा- बच्चे का भविष्य रूढ़िवादी सोच से नहीं तय होगा


बच्चे की कस्टडी के एक मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट की टिप्पणियों पर कड़ी नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी के कथित ‘पवित्र कर्तव्यों’ और परिवार की ‘बहू’ के रूप में उसकी भूमिका को बच्चे की कस्टडी तय करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने ऐसी टिप्पणियों को न केवल अनावश्यक और आधारहीन, बल्कि ‘प्रतिगामी’ और रूढ़िवादी सोच को बढ़ावा देने वाला बताया।  बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष एस. चव्हाण की पीठ ने 1 सितंबर 2026 को Kshitija Anup Gogate बनाम Anup Anil Gogate मामले में यह फैसला सुनाया। मामला पुणे फैमिली कोर्ट के 16 मई 2026 के उस आदेश से जुड़ा था, जिसमें 10 वर्षीय बच्चे की अंतरिम कस्टडी उसके पिता को सौंपने का निर्देश दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस आदेश को रद्द कर दिया और मां को बच्चे की अंतरिम कस्टडी जारी रखने की अनुमति दी।


क्या है पूरा मामला?

पति-पत्नी की शादी 18 मार्च 2012 को पुणे में हुई थी और 16 मार्च 2016 को उनके बेटे का जन्म हुआ। परिवार करीब जुलाई 2022 में सिंगापुर चला गया था, जहां बच्चे का दाखिला स्कूल में कराया गया। बाद में पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद, घरेलू हिंसा और भावनात्मक प्रताड़ना जैसे आरोपों को लेकर विवाद बढ़ गया। 11 मार्च 2025 को मां बच्चे को लेकर भारत लौट आई और इसके बाद बच्चा लगातार पुणे में उसके साथ रहा। पिता ने बच्चे की अंतरिम कस्टडी और उसे सिंगापुर ले जाने की अनुमति के लिए पुणे फैमिली कोर्ट का रुख किया। पहले फैमिली कोर्ट ने मई 2025 में दोनों अभिभावकों के लिए मुलाकात और बच्चे से संपर्क का कार्यक्रम तय किया था। इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा और 13 फरवरी 2026 को हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को बच्चे के कल्याण को केंद्र में रखते हुए अंतरिम कस्टडी के सवाल पर दोबारा फैसला करने को कहा था।

इसके बाद 16 मई 2026 को फैमिली कोर्ट ने बच्चे की अंतरिम कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश दिया। इसी आदेश को मां ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।


‘पवित्र पत्नी’ वाली टिप्पणी पर हाईकोर्ट नाराज

हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने पति-पत्नी के बीच विवाद पर जरूरत से ज्यादा ध्यान दिया और मां के कथित वैवाहिक आचरण को बच्चे की कस्टडी से जोड़ दिया। फैमिली कोर्ट ने पत्नी के पति के प्रति कथित ‘पवित्र कर्तव्यों’, घर संभालने, पति को भावनात्मक और शारीरिक सहयोग देने तथा परिवार में ‘बहू’ की भूमिका निभाने जैसी बातों का उल्लेख किया था। इसी आधार पर फैमिली कोर्ट ने मां के साथ बच्चे के भविष्य को लेकर भी प्रतिकूल टिप्पणी की थी। हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों पर सख्त आपत्ति जताते हुए कहा कि पत्नी के कथित ‘पवित्र कर्तव्यों’ या परिवार की ‘बहू’ के रूप में उससे अपेक्षित भूमिका को बच्चे के हित से जोड़ना अनुचित है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी टिप्पणियां वैवाहिक संबंधों को लेकर रूढ़िवादी और गलत धारणाओं को मजबूत करती हैं। न्यायाधीशों को मामले के तथ्यों से असंबंधित टिप्पणियां करते समय विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए।


बच्चे का कल्याण ही सबसे अहम

हाईकोर्ट ने साफ किया कि अंतरिम कस्टडी के मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि बच्चे के शारीरिक, भावनात्मक, शैक्षणिक और मनोवैज्ञानिक कल्याण के लिए कौन-सा विकल्प बेहतर है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि Guardians and Wards Act की धारा 12 के तहत अंतरिम कस्टडी तय करते समय बच्चे का कल्याण मुख्य कसौटी है। हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने ऐसा कोई ठोस और स्वतंत्र आकलन नहीं किया जिससे यह साबित हो कि मां के पास रहना बच्चे के लिए नुकसानदायक था। अदालत ने यह भी नोट किया कि बच्चा पुणे में अच्छी तरह से स्थापित था और उसके नाना-नानी, विस्तारित परिवार तथा सामाजिक परिवेश के साथ उसके मजबूत भावनात्मक संबंध थे।


पिता की आर्थिक स्थिति को भी बनाया आधार

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश में एक और विरोधाभास की ओर इशारा किया। फैमिली कोर्ट ने कहा था कि माता-पिता की आर्थिक क्षमता कस्टडी तय करने का आधार नहीं हो सकती, लेकिन साथ ही पिता की आर्थिक स्थिति, सिंगापुर में 3-BHK फ्लैट, स्कूल, पार्क, घरेलू सहायक और बच्चे के लिए अलग कमरा जैसी सुविधाओं का उल्लेख किया था। हाईकोर्ट ने इसे आंतरिक रूप से विरोधाभासी माना और कहा कि केवल आर्थिक श्रेष्ठता को बच्चे की कस्टडी का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता।


मां के पास रहेगी अंतरिम कस्टडी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 16 मई 2026 के फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए बच्चे की अंतरिम कस्टडी मां के पास रहने दी। साथ ही पिता को बच्चे से हर तीन महीने में फिजिकल एक्सेस देने और छुट्टियों के दौरान आपसी सहमति से मुलाकात की व्यवस्था करने का निर्देश दिया गया। पिता को सप्ताह में कम से कम एक बार वीडियो कॉल की सुविधा भी देने को कहा गया। मुख्य कस्टडी विवाद का फैसला फैमिली कोर्ट को कानून के अनुसार करना है।