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सूट दायर होने से पहले अधिकार सौंपे तो Assignee को Co-Plaintiff नहीं बनाया जा सकता: बॉम्बे HC का बड़ा फैसला
सूट दाखिल होने से पहले ही अपने अधिकार किसी तीसरे पक्ष को सौंप चुके मूल वादी के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ Assignment Deed के आधार पर तीसरे पक्ष को Order I Rule 10 CPC के तहत Co-Plaintiff नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने ट्रायल कोर्ट का ऐसा आदेश रद्द कर दिया।

सूट दाखिल करने से पहले ही यदि मूल वादी अपने अधिकार किसी तीसरे पक्ष को सौंप चुका है, तो केवल इस Assignment के आधार पर उस तीसरे पक्ष को बाद में मुकदमे में Co-Plaintiff नहीं बनाया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट ने Order I Rule 10 CPC की व्याख्या करते हुए कहा कि इस प्रावधान का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है जब वाद गलत व्यक्ति के नाम पर दाखिल होना किसी bona fide mistake का परिणाम हो। जस्टिस गौरी गोडसे ने Savita Arun Zambre बनाम Manjari Projects Private Limited मामले में यह फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए Assignment Deed के आधार पर एक तीसरे पक्ष को Co-Plaintiff के रूप में मुकदमे में शामिल करने की अनुमति दी गई थी।
क्या है पूरा मामला?
यह विवाद Development Agreements से जुड़े एक Specific Performance Suit का है। Manjari Projects Private Limited ने 15 दिसंबर 2006 के Development Agreement और 22 अगस्त 2007 के Supplementary Agreement के Specific Performance की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। इन समझौतों को प्रतिवादियों ने मूल वादी के पक्ष में निष्पादित किया था। मामले में 17 अप्रैल 2009 को जारी उस नोटिस को भी चुनौती दी गई थी, जिसके जरिए दोनों समझौतों को समाप्त करने की बात कही गई थी। हालांकि, महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि मुकदमा दायर होने से पहले ही मूल वादी ने Development Agreement और Power of Attorney से जुड़े अपने सभी अधिकार एक तीसरे पक्ष को Assignment Deed के जरिए सौंप दिए थे। इसके बाद तीसरे पक्ष को मुकदमे में Co-Plaintiff के तौर पर शामिल करने की अनुमति दी गई। ट्रायल कोर्ट के इसी आदेश को मूल प्रतिवादियों ने बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
प्रतिवादियों ने क्या दलील दी?
प्रतिवादियों की ओर से दलील दी गई कि तीसरे पक्ष को मुकदमे में शामिल करने का एकमात्र आधार Assignment Deed है। लेकिन यह Assignment मुकदमा दायर होने से पहले ही हो चुका था। इसलिए Order I Rule 10 CPC के तहत तीसरे पक्ष को Co-Plaintiff बनाने का आधार मौजूद नहीं था। प्रतिवादियों ने कहा कि यदि मूल वादी ने मुकदमा दायर करने से पहले ही अपने सभी अधिकार किसी और को सौंप दिए थे, तो यह maintainability का सवाल भी बनता है और प्रतिवादियों को इस आधार पर मुकदमे का विरोध करने का अधिकार है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना कि इसमें कोई विवाद नहीं था कि Assignment Deed मुकदमा दायर होने से पहले निष्पादित की गई थी। Assignment के बाद मूल वादी ने Development Agreement और Power of Attorney से जुड़े अपने अधिकार तीसरे पक्ष को सौंप दिए थे। कोर्ट ने कहा कि Order I Rule 10 CPC के तहत किसी तीसरे पक्ष को Co-Plaintiff के रूप में शामिल करने की शक्ति का इस्तेमाल तब किया जा सकता है, जब मुकदमा गलत व्यक्ति के नाम से किसी bona fide mistake के कारण दायर हुआ हो और विवाद के वास्तविक मुद्दे को तय करने के लिए उस व्यक्ति को जोड़ना या उसका नाम बदलना आवश्यक हो। लेकिन इस मामले में ऐसी कोई bona fide mistake नहीं थी।
Assignment पहले हुआ, मुकदमा बाद में
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि Assignment मुकदमा दायर होने से पहले ही हो चुका था। इसलिए केवल उस Assignment के आधार पर तीसरे पक्ष को Order I Rule 10 CPC के तहत Co-Plaintiff बनाना कानूनन उचित नहीं था। कोर्ट ने कहा कि यदि मुकदमा लंबित रहने के दौरान यानी pendente lite अधिकार किसी दूसरे व्यक्ति को ट्रांसफर होते, तो ऐसी स्थिति Order XXII Rule 10 CPC के तहत आती। लेकिन मौजूदा मामले में Assignment मुकदमा दाखिल होने से पहले ही हो चुका था।
‘Litigation खरीदा’ वाली दलील भी खारिज
ट्रायल कोर्ट ने तीसरे पक्ष को आवश्यक पक्षकार मानने के लिए यह भी कहा था कि उसने litigation यानी मुकदमे में मौजूद अधिकारों को खरीदा है और इसलिए वह मूल वादी के स्थान पर आने का हकदार है। हाईकोर्ट ने इस reasoning को गलत बताया। कोर्ट ने कहा कि जब मूल वादी ने मुकदमा दाखिल करने से पहले ही अपने अधिकार तीसरे पक्ष को सौंप दिए थे, तो यह कहना उचित नहीं है कि तीसरे पक्ष ने मुकदमा लंबित रहने के दौरान litigation खरीदा या वह बाद में plaintiff के shoes में आया। यानी तीसरे पक्ष की स्थिति उस व्यक्ति जैसी नहीं थी, जिसने मुकदमा दायर होने के बाद लंबित मुकदमे से जुड़े अधिकार हासिल किए हों।
Defendants को गंभीर prejudice का खतरा
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि तीसरे पक्ष को Co-Plaintiff के रूप में शामिल करने से प्रतिवादियों को गंभीर prejudice हो सकता है। इसलिए ट्रायल कोर्ट द्वारा impleadment application को अनुमति देने वाला आदेश कायम नहीं रखा जा सकता। इसी आधार पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को quash और set aside कर दिया।
क्या है Order I Rule 10 CPC?
Order I Rule 10 CPC अदालत को किसी ऐसे व्यक्ति को मुकदमे में जोड़ने की शक्ति देता है, जिसकी मौजूदगी विवाद के वास्तविक मुद्दे को प्रभावी ढंग से तय करने के लिए आवश्यक हो। हालांकि, इस शक्ति का इस्तेमाल कानून में निर्धारित परिस्थितियों के अनुसार ही किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले में स्पष्ट किया कि इस प्रावधान का इस्तेमाल किसी ऐसे Assignment को बाद में सुधारने के लिए नहीं किया जा सकता, जो मुकदमा दायर होने से पहले ही मूल वादी को उसके अधिकारों से वंचित कर चुका था।
