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“सिर्फ FIR दर्ज होने से पुलिस की नौकरी नहीं जाएगी! इलाहाबाद HC ने कहा- Criminal Case के आधार पर Automatic Disqualification नहीं”
पुलिस सेवा में भर्ती को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ सिर्फ आपराधिक मामला दर्ज होना उसे पुलिस सेवा से अयोग्य ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। उम्मीदवार के Character, Antecedents और नौकरी के लिए उसकी Suitability का नियमानुसार स्वतंत्र आकलन करना जरूरी है।

पुलिस सेवा में भर्ती को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि किसी उम्मीदवार के खिलाफ सिर्फ आपराधिक मामला दर्ज होने से उसे पुलिस सेवा में नियुक्ति से यांत्रिक तरीके से बाहर नहीं किया जा सकता। संबंधित उम्मीदवार के चरित्र, आपराधिक पृष्ठभूमि, मामले की प्रकृति और उसकी overall suitability का निष्पक्ष आकलन करना जरूरी है।
1958 के Government Order का हवाला
जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार का 28 अप्रैल 1958 का Government Order सरकारी सेवा में नियुक्ति से पहले उम्मीदवार के character और antecedents की जांच की व्यवस्था करता है। इस आदेश में ऐसा कोई blanket rule नहीं है कि जिसके खिलाफ कोई criminal case दर्ज हो गया हो, उसे स्वतः सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य मान लिया जाए। कोर्ट के मुताबिक इस प्रक्रिया का उद्देश्य यह तय करना है कि संबंधित व्यक्ति वास्तव में उस पद के लिए उपयुक्त है या नहीं। खासतौर पर पुलिस सेवा में नियुक्ति के मामलों में अधिकारियों को केवल FIR या पुलिस रिपोर्ट देखकर फैसला नहीं करना चाहिए।
Constable की नौकरी से हटाने का था मामला
यह मामला Janmesh Kumar से जुड़ा था, जिन्हें Civil Police में Constable के पद पर चयन के बाद नियुक्त किया गया था। उन्हें अलीगढ़ में नियुक्ति मिली थी और बाद में ट्रेनिंग के लिए फिरोजाबाद भेजा गया, जहां उन्होंने 8 अक्टूबर 1997 को ज्वाइन किया। लेकिन ज्वाइन करने के करीब 20 दिन बाद उनकी सेवाएं इस आधार पर समाप्त कर दी गईं कि चयन से पहले उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित था और उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी थी। संबंधित मामला Crime No. 88 of 1994 था, जिसमें IPC की धाराओं 147, 148, 323, 504 और 325 के तहत आरोप थे। बाद में 19 सितंबर 1997 को उन्हें समझौते के आधार पर मामले में बरी कर दिया गया था। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि उम्मीदवार ने criminal case की जानकारी छिपाई थी और इसलिए उसकी नियुक्ति जारी नहीं रखी जा सकती।
HC ने कहा- सिर्फ केस दर्ज होना पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल किसी criminal case की registration को नौकरी से बाहर करने का automatic आधार नहीं बनाया जा सकता। मामले की प्रकृति और परिस्थितियों को देखना जरूरी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित अपराध compoundable थे और उनमें moral turpitude या murder, dacoity और rape जैसे गंभीर अपराध की प्रकृति नहीं थी। इसलिए, अदालत के अनुसार, उम्मीदवार को केवल इस आधार पर पुलिस सेवा के लिए अनुपयुक्त नहीं माना जा सकता था।
उम्मीदवार को केस की जानकारी थी या नहीं, इस पर भी सवाल
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि रिकॉर्ड से FIR दर्ज होने की तारीख स्पष्ट नहीं थी। इसलिए यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता था कि उम्मीदवार को आवेदन और चयन के समय उस मामले की जानकारी थी। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि सरकार यह आरोप लगाती है कि उम्मीदवार को मामले की जानकारी थी, तो यह दिखाना भी जरूरी है कि उसने जमानत के लिए आवेदन किया था, जांच में हिस्सा लिया था या ट्रायल की कार्यवाही में शामिल हुआ था। इस मामले में ऐसी कोई ठोस दलील सामने नहीं रखी गई।
“Mechanical Approach” पर कोर्ट की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने अधिकारियों के उस रवैये को स्वीकार नहीं किया जिसमें criminal case की जानकारी मिलते ही उम्मीदवार को नौकरी से बाहर कर दिया गया। कोर्ट ने कहा कि कानून ऐसा कोई “mechanical” या automatic exclusion नहीं करता। अदालत ने माना कि Police Headquarters और Superintendent of Police ने उम्मीदवार की suitability का उचित मूल्यांकन किए बिना कार्रवाई की थी। हाईकोर्ट ने राज्य की विशेष अपील खारिज कर दी और पहले के आदेश को बरकरार रखा।
