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₹1.50 लाख का चेक बाउंस, ‘सिक्योरिटी चेक’ की दलील भी नहीं चली; कल्याण कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को 1 महीने की सजा सुनाई

₹1.50 लाख के चेक बाउंस मामले में कल्याण कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी अजितनाथ रामकिसन बड़े को दोषी ठहराते हुए एक महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई है। कोर्ट ने ‘सिक्योरिटी चेक’ की दलील को खारिज करते हुए आरोपी को शिकायतकर्ता को ₹1.50 लाख मुआवजा देने का भी आदेश दिया है।

Sonali10 सित. 2026, 06:59 PM IST
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₹1.50 लाख का चेक बाउंस, ‘सिक्योरिटी चेक’ की दलील भी नहीं चली; कल्याण कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को 1 महीने की सजा सुनाई

यह फैसला कल्याण के Additional Chief Judicial Magistrate, Third Court की पीठासीन अधिकारी श्वेता एस. घारे ने 9 सितंबर 2026 को सुनाया। मामला SCC No. 71/2023 था और आरोपी अजितनाथ रामकिसन बड़े के खिलाफ Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज की गई थी। शिकायतकर्ता सुनील बंसी कीर्तने ‘जय भगवान बाबा सर्विस सेंटर’ नाम से वॉशिंग सेंटर चलाते हैं। अदालत में पेश मामले के अनुसार, आरोपी और शिकायतकर्ता एक-दूसरे को वर्ष 2015 से जानते थे। अगस्त 2020 में आरोपी ने कारोबारी जरूरत के लिए आर्थिक मदद मांगी। शिकायतकर्ता ने उसे दोस्ताना कर्ज के तौर पर ₹1.50 लाख नकद दिए। शिकायतकर्ता के अनुसार, आरोपी ने रकम वापस करने का आश्वासन दिया था और बाद में ₹1.50 लाख का चेक जारी किया। चेक नंबर 222693 की तारीख 13 सितंबर 2021 थी। जब शिकायतकर्ता ने यह चेक बैंक में जमा किया तो 17 सितंबर 2021 को वह ‘Funds Insufficient’ की वजह से बाउंस हो गया।


इसके बाद शिकायतकर्ता ने 27 सितंबर 2021 को आरोपी को कानूनी मांग नोटिस भेजा। रिकॉर्ड के अनुसार नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजा गया और 28 सितंबर 2021 को उसकी डिलीवरी की पुष्टि हुई। इसके बावजूद आरोपी ने निर्धारित अवधि में भुगतान नहीं किया। इसके बाद जनवरी 2023 में अदालत में शिकायत दाखिल की गई।

सुनवाई के दौरान आरोपी ने आरोपों से इनकार किया। उसका कहना था कि चेक सिक्योरिटी के तौर पर चिट फंड यानी भिशी के लिए दिया गया था और शिकायतकर्ता अतिरिक्त रकम वसूलने के लिए झूठा मामला लेकर आया है। हालांकि, अदालत ने इस बचाव को पर्याप्त नहीं माना। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Rangappa बनाम Srimohan फैसले का हवाला देते हुए कहा कि Negotiable Instruments Act की धारा 139 के तहत चेक किसी कानूनी रूप से वसूल योग्य कर्ज या देनदारी के निर्वहन के लिए जारी होने की प्रारंभिक कानूनी धारणा बनती है। यह धारणा आरोपी द्वारा विश्वसनीय साक्ष्य से rebut की जा सकती है, लेकिन केवल बयान या सामान्य सुझाव पर्याप्त नहीं हैं। अदालत ने यह भी गौर किया कि आरोपी ने चेक पर अपने हस्ताक्षर होने से इनकार नहीं किया था। कोर्ट के मुताबिक, यदि चेक वास्तव में किसी मौजूदा देनदारी के बिना केवल सिक्योरिटी के लिए दिया गया था, तो आरोपी चेक वापस मांगने, बैंक को stop payment निर्देश देने या अन्य ठोस कदम उठाने का प्रयास कर सकता था। लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस कदम सामने नहीं आया।


कानूनी नोटिस की सेवा को लेकर भी आरोपी की आपत्ति को अदालत ने स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि नोटिस सही पते पर, पर्याप्त डाक शुल्क के साथ रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजे जाने पर General Clauses Act की धारा 27 के तहत सेवा की कानूनी धारणा लागू होती है। इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि शिकायतकर्ता ने ₹1.50 लाख की कानूनी देनदारी, चेक जारी होने, उसके बाउंस होने और नोटिस के बाद भुगतान न किए जाने के आवश्यक तत्व साबित कर दिए हैं। इसके आधार पर आरोपी अजितनाथ रामकिसन बड़े को Negotiable Instruments Act की धारा 138 के अपराध में दोषी ठहराया गया। अदालत ने उसे एक महीने की साधारण कैद की सजा सुनाई। साथ ही आरोपी को शिकायतकर्ता को ₹1.50 लाख का मुआवजा दो महीने के भीतर देने का आदेश दिया। मुआवजा नहीं देने पर उसे अतिरिक्त एक महीने की साधारण कैद भुगतनी होगी।