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‘कानून भेदभाव की इजाजत नहीं देता’, सफाईकर्मियों को 18 साल से आवास नीति का लाभ न मिलने पर BMC पर बॉम्बे HC सख्त

मुंबई के सफाईकर्मियों को आवास का लाभ देने में 18 साल की देरी पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने BMC को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों के पदानुक्रम में निचले स्तर पर होने के कारण सफाईकर्मियों के साथ भेदभाव नहीं किया जा सकता और कानून इसकी इजाजत नहीं देता।

Sonali11 सित. 2026, 07:47 PM IST
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‘कानून भेदभाव की इजाजत नहीं देता’, सफाईकर्मियों को 18 साल से आवास नीति का लाभ न मिलने पर BMC पर बॉम्बे HC सख्त

बॉम्बे हाईकोर्ट ने मुंबई के सफाईकर्मियों को आवास उपलब्ध कराने की सरकारी नीति लागू करने में करीब 18 साल की देरी पर बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि सफाईकर्मी नगर निगम के कर्मचारियों की पदानुक्रम में निचले स्तर पर होने के कारण भेदभाव के पात्र नहीं हो सकते। कानून नगर निगम को उनके साथ इस आधार पर भेदभाव करने की अनुमति नहीं देता। जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस डॉ. नीला गोखले की खंडपीठ सफाईकर्मियों को राज्य सरकार की ओर से दिए गए आवास संबंधी लाभ से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी।

2008 में बनी थी आवास नीति

कोर्ट ने बताया कि महाराष्ट्र सरकार ने वर्ष 2008 में एक नीति तैयार की थी, जिसके तहत मुंबई नगर निगम के सफाईकर्मियों को स्वामित्व के आधार पर आवास उपलब्ध कराया जाना था। हालांकि, इस नीति को लागू करने में लगभग 18 साल बीत जाने के बावजूद सफाईकर्मियों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल सका। हाईकोर्ट ने सफाईकर्मियों की स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा कि वे समाज और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण काम करते हैं। इसके बावजूद वे सबसे अधिक शोषित, हाशिए पर रहने वाले और कमजोर कार्यबल में शामिल हैं। कोर्ट ने कहा कि सरकारी नीति के तहत स्थायी छत पाने के उनके अधिकार के मामले में व्यवस्था की उपेक्षा नहीं की जा सकती।

BMC के रवैये पर कोर्ट नाराज

पीठ ने BMC के रवैये को बेहद लापरवाह बताया और सवाल उठाया कि आखिर इतने लंबे समय तक सफाईकर्मियों के आवास संबंधी दावे को क्यों नजरअंदाज किया गया।

कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब नगर निगम के पास पर्याप्त संसाधन और मूल्यवान जमीन उपलब्ध है, तो सफाईकर्मियों को उनके वैधानिक और नीतिगत लाभ से वंचित क्यों रखा जा रहा है। पीठ ने इस बात पर भी सवाल किया कि नगर निगम की जमीन विभिन्न कारणों से सार्वजनिक पूल से निकलती रही है, लेकिन सफाईकर्मियों के लिए तय लाभ अब तक लागू नहीं किया गया।

‘सबसे निचले स्तर पर होने के कारण भेदभाव कैसे?’

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर सवाल उठाया कि क्या नगर निगम के आयुक्त या प्रशासनिक तंत्र के लिए कर्मचारियों की पदानुक्रम में निचले स्तर पर होने के कारण किसी वर्ग की उपेक्षा करना उचित है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कानून BMC को सफाईकर्मियों के साथ भेदभाव करने की अनुमति नहीं देता। पीठ ने माना कि सफाईकर्मी शहर की स्वच्छता और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और उनके साथ सम्मानजनक व्यवहार तथा सरकारी नीति के अनुसार लाभ सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

करीब दो दशक से इंतजार

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वर्ष 2008 में नीति बनाए जाने के बावजूद करीब 18 वर्षों तक उसका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं हुआ। हाईकोर्ट ने इस देरी को गंभीरता से लेते हुए नगर निगम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। अदालत की टिप्पणियां यह संकेत देती हैं कि सरकारी नीतियों में घोषित कल्याणकारी लाभ केवल कागजों तक सीमित नहीं रह सकते। यदि किसी विशेष वर्ग के कर्मचारियों के लिए आवास जैसी नीति बनाई गई है, तो संबंधित प्रशासनिक संस्था की जिम्मेदारी है कि उसे उचित समय में लागू करे। बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी सफाईकर्मियों के अधिकार, समानता और कल्याणकारी सरकारी नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।