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वन भूमि की सीमाओं पर केंद्र का बड़ा कदम, राज्यों को Time-Bound Action Plan
नई दिल्ली: केंद्र सरकार देश की Forest Boundaries को Digital और Geo-Referenced बनाने पर जोर दे रही है। इसके तहत GIS Mapping, DGPS/CORS आधारित Geo-Referencing और Digital Forest Boundary Database तैयार करने की योजना है। Forest Records को Revenue Records और Cadastral Maps से जोड़ने के साथ राज्यों में GIS-based Decision Support System विकसित किया जाएगा। इससे Forest Land की पहचान, Encroachment Monitoring, Forest Diversion और Compensatory Afforestation की निगरानी को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने देश में Forest Boundaries यानी वन सीमाओं के डिजिटलीकरण को तेज करने पर फोकस बढ़ा दिया है। 10 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने वन और वृक्ष संसाधनों के आकलन में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की। इसमें Forest Boundary Digitisation, Forest and Tree Cover Assessment और Carbon Stock Estimation पर तकनीकी सत्र हुए। इस पहल का उद्देश्य देश की वन भूमि की सीमाओं को ज्यादा सटीक, डिजिटल और Geospatial तरीके से रिकॉर्ड करना है। सरकार का मानना है कि आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल से वन भूमि की पहचान, निगरानी और प्रबंधन को मजबूत किया जा सकता है। इसके लिए GIS यानी Geographic Information System आधारित व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया जा रहा है।
पुराने नक्शों की जगह Geo-Referenced रिकॉर्ड
वन सीमाओं के रिकॉर्ड में लंबे समय से Traverse Sketches और Non-Geo-Referenced Maps का इस्तेमाल होता रहा है। ऐसे रिकॉर्ड को वास्तविक भौगोलिक स्थिति से मिलाने में दिक्कत आ सकती है। इसी वजह से केंद्र अब DGPS और CORS आधारित Geo-Referencing के जरिए वन सीमाओं को सटीक भौगोलिक निर्देशांकों से जोड़ने की दिशा में काम कर रहा है। अप्रैल 2026 में National Authority CAMPA ने नई दिल्ली में Settlement and Digitisation of Forest Boundaries पर राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित की थी। इसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकारियों के साथ वन सीमाओं के GIS आधारित डिजिटलीकरण को तेज करने के लिए तीन साल का तकनीकी और संस्थागत ढांचा प्रस्तुत किया गया था।
Cadastral Maps और Revenue Records से जुड़ेगा Forest Data
नई व्यवस्था में सिर्फ Forest Department के रिकॉर्ड को डिजिटल करना ही लक्ष्य नहीं है। Cadastral Maps और Revenue Data को भी वन सीमाओं के डिजिटल रिकॉर्ड के साथ जोड़ने की योजना है। इसके लिए Revenue Departments के साथ Joint Verification की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है। इससे वन भूमि और राजस्व भूमि की सीमाओं के रिकॉर्ड का बेहतर मिलान किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया में Forest Rights Act, 2006 के तहत आने वाले अधिकारों और दावों को भी ध्यान में रखने पर जोर है। प्रस्तावित ढांचे में Public Consultation और Dispute Resolution को भी शामिल किया गया है, ताकि वन सीमा निर्धारण के दौरान संबंधित अधिकारों और भूमि रिकॉर्ड की स्थिति को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
Forest Encroachment और Diversion की निगरानी होगी मजबूत
डिजिटल और Geo-Referenced Forest Boundaries तैयार होने से Forest Land Encroachment की पहचान और निगरानी को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा वन भूमि के Diversion और Compensatory Afforestation Sites की Monitoring भी ज्यादा व्यवस्थित तरीके से की जा सकेगी। Digital Forest Boundary Database के जरिए अधिकारियों के पास वन भूमि की Geospatial Information उपलब्ध होगी। इससे किसी क्षेत्र में भूमि उपयोग बदलने, विकास परियोजना प्रस्तावित होने या वन भूमि से संबंधित रिकॉर्ड की जांच के दौरान संबंधित क्षेत्र की पहचान आसान हो सकती है।
हर राज्य में GIS Decision Support System
केंद्र ने प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में GIS-based Decision Support System विकसित करने की दिशा में भी कदम बढ़ाया है। National Authority CAMPA को Policy Oversight, Technical Standardisation, Quality Assurance और Monitoring की जिम्मेदारी दी गई है। साथ ही Centralised National GIS Repository बनाने की योजना है। इस तकनीकी काम में Forest Survey of India (FSI), Indian Institute of Remote Sensing (IIRS), BISAG-N और National Remote Sensing Centre (NRSC) जैसी संस्थाओं की विशेषज्ञता का इस्तेमाल किया जाना है। इसका मकसद वन सीमाओं से संबंधित डेटा के लिए बेहतर तकनीकी मानक और एक समान प्रणाली विकसित करना है।
राज्यों को तैयार करना होगा Time-Bound Action Plan
केंद्र ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को Forest Boundary Digitisation के लिए Time-Bound Action Plan तैयार करने को कहा है। इसे वित्त वर्ष 2026-27 के Annual Plan of Operations का हिस्सा बनाया जाना है। इसके लिए तीन साल की Implementation Period का ढांचा रखा गया है और CAMPA के तहत उपलब्ध Net Present Value (NPV) Funds के इस्तेमाल का प्रावधान बताया गया है। ओडिशा ने इस दिशा में अपना मॉडल भी प्रस्तुत किया है। इसमें Standard Operating Procedures (SOPs), Documentation और Notification Protocols के जरिए वन सीमाओं के डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को व्यवस्थित किया गया है। केंद्र ने इसे दूसरे राज्यों के लिए एक उपयोगी उदाहरण के तौर पर सामने रखा।
Supreme Court के निर्देश से भी जुड़ा है मामला
Forest Boundary Digitisation का संबंध सुप्रीम कोर्ट के 7 जुलाई 2011 के Lafarge Umiam Mining मामले में दिए गए निर्देश से भी है। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को Geo-Referenced Forest Land का GIS-based Decision Support Database तैयार करने और उसे नियमित रूप से अपडेट करने का निर्देश दिया था। National Authority CAMPA की अप्रैल 2026 की कार्यशाला में इसी अनुपालन को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।
Forest Governance में Technology का बढ़ता इस्तेमाल
10 सितंबर की राष्ट्रीय कार्यशाला में पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने Forest Assessment में Latest Technology, Indigenous Capabilities, बेहतर Data Quality और Standardised SOPs के इस्तेमाल पर जोर दिया। मंत्रालय के अनुसार, आधुनिक तकनीक से Forest and Tree Resources की Assessment, Monitoring और Management को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। इस पूरी प्रक्रिया को Forest Cover और Carbon Stock की निगरानी से भी जोड़ा जा रहा है। यानी सरकार का फोकस अब केवल जंगल का क्षेत्रफल मापने तक सीमित नहीं है, बल्कि वन सीमा, वन आवरण, कार्बन स्टॉक और जमीन से जुड़े Geospatial Records को तकनीक के जरिए बेहतर तरीके से रिकॉर्ड करने पर है।
कुल मिलाकर, Forest Boundaries की Digitisation भारत में Forest Land Governance को ज्यादा सटीक और पारदर्शी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। GIS Mapping, Geo-Referencing, Revenue Records और Cadastral Maps के एकीकरण से वन भूमि की पहचान और निगरानी मजबूत हो सकती है। साथ ही इससे Forest Diversion, Encroachment और Compensatory Afforestation जैसे मामलों की Monitoring के लिए भी ज्यादा व्यवस्थित डिजिटल आधार तैयार होगा।
