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गन्ने की कम सप्लाई से चीनी मिल बंद हुई तो भुगतान में देरी का बहाना नहीं चलेगा, भेदभावपूर्ण आवंटन पर इलाहाबाद HC सख्त

गन्ने के कम आवंटन से चीनी मिल की पेराई और भुगतान क्षमता प्रभावित हुई तो बाद में भुगतान में देरी का हवाला नहीं दिया जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भेदभावपूर्ण गन्ना आवंटन पर सख्त रुख अपनाते हुए यदु शुगर लिमिटेड को उसकी अनुमानित जरूरत के अनुसार गन्ना देने का निर्देश दिया।

Sonali11 सित. 2026, 07:47 PM IST
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गन्ने की कम सप्लाई से चीनी मिल बंद हुई तो भुगतान में देरी का बहाना नहीं चलेगा, भेदभावपूर्ण आवंटन पर इलाहाबाद HC सख्त

गन्ना आवंटन में भेदभाव को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी चीनी मिल को उसकी अनुमानित जरूरत से कम गन्ना आवंटित करने को कम उठाव या गन्ने की कीमत के भुगतान में कथित देरी के आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता। खासकर तब, जब कम आवंटन ही मिल के कम गन्ना उठाव और भुगतान करने की क्षमता प्रभावित होने का कारण बना हो। न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने यह टिप्पणी बदायूं जिले में चीनी मिल संचालित करने वाली यदु शुगर लिमिटेड की ओर से दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई के दौरान की। हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए गन्ना आयुक्त को 2026-27 के पेराई सत्र के लिए चीनी मिल की अनुमानित आवश्यकता के अनुसार गन्ने का आवंटन करने का निर्देश दिया। साथ ही, पूरे 180 दिन के पेराई सत्र के दौरान चीनी मिल को गन्ने की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने को कहा।

कम आवंटन को भुगतान में देरी का आधार नहीं बनाया जा सकता

मामले में चीनी मिल की ओर से दलील दी गई थी कि उसे उसकी वास्तविक जरूरत के मुकाबले कम गन्ना आवंटित किया गया। राज्य की ओर से मिल के कम गन्ना उठाव और गन्ने की कीमत के भुगतान में देरी जैसे कारणों का हवाला दिया गया था। हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने माना कि यदि किसी चीनी मिल को उसकी अनुमानित आवश्यकता से ही कम गन्ना दिया जाएगा, तो उसका गन्ना उठाव स्वाभाविक रूप से कम होगा। ऐसे में बाद में कम उठाव को ही मिल के खिलाफ आधार बनाना उचित नहीं होगा। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को अनुमानित आवश्यकता की तुलना में कम आवंटन दिए जाने के कारण कम उठाव प्रतिशत के लिए मजबूर होना पड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि चीनी मिल को अंततः बंद करना पड़ा। अदालत ने माना कि मिल को उसकी आवश्यकता से काफी कम गन्ना उपलब्ध कराना ही उसके बंद होने का मूल कारण था।

अन्य चीनी मिलों को गन्ना देने पर भी सवाल

अदालत ने यह भी पाया कि राज्य की मशीनरी ने याचिकाकर्ता को पर्याप्त गन्ना उपलब्ध कराने के बजाय गन्ने को अन्य चीनी मिलों की ओर पुनः आवंटित किया। हाईकोर्ट के अनुसार, जब याचिकाकर्ता को पहले ही उसकी अनुमानित आवश्यकता के मुकाबले कम गन्ना दिया गया था, तब उसके हिस्से की कमी को अन्य मिलों को देना उचित नहीं था।

कोर्ट ने इस पूरी स्थिति में याचिकाकर्ता के साथ अन्य सात चीनी मिलों की तुलना में भेदभाव को स्पष्ट माना। अदालत ने कहा कि कम आवंटन के कारण पैदा हुई स्थिति को बाद में मिल के कम उठाव या भुगतान क्षमता के आधार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

गन्ने की वास्तविक उपलब्धता का भी रखना होगा ध्यान

हाईकोर्ट ने गन्ना आवंटन की प्रक्रिया से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू भी सामने रखा। अदालत ने कहा कि गन्ने की पूरी आपूर्ति अंततः पेराई के लिए उपलब्ध नहीं होती। लगभग 60 प्रतिशत गन्ना ही वास्तव में पेराई के लिए उपलब्ध रहता है, जबकि करीब 40 प्रतिशत हिस्सा चोरी और अन्य कारणों से होने वाले नुकसान में चला जाता है। इसलिए गन्ने का आवंटन करते समय चीनी मिल की वास्तविक और अनुमानित जरूरत के साथ इस तरह के नुकसान को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। केवल कागज पर उपलब्ध गन्ने की मात्रा के आधार पर आवंटन करने से चीनी मिल की वास्तविक पेराई क्षमता प्रभावित हो सकती है।

180 दिन के पेराई सत्र के लिए निर्बाध आपूर्ति का निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले में यदु शुगर लिमिटेड की याचिका स्वीकार करते हुए गन्ना आयुक्त को 2026-27 के पेराई सत्र के लिए मिल की अनुमानित आवश्यकता के अनुसार गन्ना आवंटित करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा कि 180 दिन के पेराई सत्र के दौरान चीनी मिल को गन्ने की आपूर्ति बाधित न हो।

इस फैसले से स्पष्ट है कि प्रशासन गन्ना आवंटन में किसी चीनी मिल के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। साथ ही, यदि कम आवंटन के कारण ही किसी मिल का उठाव कम होता है और उसकी भुगतान क्षमता प्रभावित होती है, तो बाद में उसी कम उठाव या भुगतान में देरी को उसके खिलाफ आधार बनाना उचित नहीं होगा।