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लिखित बयान में दी गई दलील से सीधे खारिज नहीं हो सकता वाद, Order 7 Rule 11 CPC पर इलाहाबाद HC का अहम फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्रतिवादी के लिखित बयान में उठाई गई किसी दलील को आधार बनाकर केवल Order 7 Rule 11(a) CPC के तहत वादपत्र खारिज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वादपत्र में कारण-ए-दावा मौजूद है या नहीं, यह तय करते समय केवल वादपत्र में किए गए कथनों को देखा जाएगा, प्रतिवादी का बचाव नहीं।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल मुकदमों में Order VII Rule 11(a) CPC के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रतिवादी अपने लिखित बयान में जो बचाव या दलील पेश करता है, उसे सामान्य तौर पर वादपत्र खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। यह तय करने के लिए कि वादपत्र में कारण-ए-दावा यानी Cause of Action मौजूद है या नहीं, अदालत को मुख्य रूप से वादपत्र में किए गए कथनों को ही देखना होगा। न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि कारण-ए-दावा का अस्तित्व और उन तथ्यों को साबित करना, जिनसे कारण-ए-दावा बनता है, दो अलग-अलग बातें हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि प्रतिवादी का कोई बचाव साबित होने पर वादी के दावे को विफल कर सकता है, तब भी उसे सामान्य तौर पर Order VII Rule 11(a) CPC के तहत वादपत्र खारिज करने का आधार नहीं बनाया जा सकता।
वादपत्र में किए गए कथन ही होंगे महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने कहा कि Order VII Rule 11(a) CPC के तहत अदालत यह देखती है कि वादपत्र को उसके मूल रूप में पढ़ने पर क्या उसमें कोई Cause of Action सामने आता है। इस चरण पर प्रतिवादी की ओर से लिखित बयान में लिए गए बचाव को ध्यान में रखकर वादपत्र की जांच नहीं की जा सकती। अदालत ने इस अंतर को महत्वपूर्ण बताया। किसी मुकदमे में वादी ने जिन तथ्यों के आधार पर अपना अधिकार या राहत मांगी है, वे यदि वादपत्र में पर्याप्त रूप से बताए गए हैं, तो केवल प्रतिवादी की ओर से उठाए गए किसी विरोधी तथ्य या बचाव के आधार पर शुरुआती स्तर पर मुकदमा खत्म नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, कारण-ए-दावा मौजूद है या नहीं और वादी अंततः अपने दावे को साबित कर पाएगा या नहीं, दोनों अलग-अलग सवाल हैं। किसी दावे को साबित करने के लिए साक्ष्य की आवश्यकता हो सकती है और वह मुकदमे की सुनवाई के दौरान तय किया जाएगा।
दुकान से जुड़ा है विवाद
यह मामला कासगंज स्थित बाजार नदरई गेट, जैन मंदिर के पास एक दुकान से जुड़े विवाद से संबंधित है। विवाद में वादी के दावे के खिलाफ प्रतिवादी की ओर से बचाव पेश किया गया था। इसी संदर्भ में वादपत्र को Order VII Rule 11 CPC के तहत खारिज किए जाने का मुद्दा हाईकोर्ट के सामने आया। प्रतिवादी की ओर से उठाई गई दलीलों को आधार बनाकर वादपत्र की maintainability पर सवाल उठाया गया था। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को स्वीकार नहीं किया और Order VII Rule 11(a) CPC के तहत वादपत्र की जांच के लिए निर्धारित कानूनी सिद्धांत को स्पष्ट किया।
मुकदमे के शुरुआती चरण में बचाव की जांच नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि Order VII Rule 11 CPC का उद्देश्य ऐसे वादों को शुरुआती स्तर पर समाप्त करना है, जिनमें कानून के अनुसार कोई वैध कारण-ए-दावा नहीं बनता। लेकिन इसका इस्तेमाल प्रतिवादी के लिखित बयान में मौजूद बचाव को परखने या उसके आधार पर वादी के दावे को प्रारंभिक स्तर पर खारिज करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि प्रतिवादी का बचाव वादी के दावे को कमजोर या समाप्त कर सकता है, तो उसे मुकदमे की सुनवाई के दौरान उचित तरीके से परखा जाएगा। केवल इस संभावना के आधार पर कि प्रतिवादी का बचाव अंततः सफल हो सकता है, वादपत्र को Order VII Rule 11(a) के तहत खारिज नहीं किया जा सकता।
इस फैसले के जरिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि वादपत्र की प्रारंभिक जांच और मुकदमे के दौरान उठाए गए बचाव के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। अदालत ने कहा कि Cause of Action के अस्तित्व और उसे साक्ष्यों के जरिए साबित करने की क्षमता को एक ही सवाल नहीं माना जा सकता।
