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26 साल बाद जमीन का आवंटन रद्द करना ‘कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’, इलाहाबाद HC ने परिवार का हक बहाल किया

1987 में हुए कृषि भूमि के आवंटन को 26 साल बाद रद्द करने की कार्रवाई पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि आवंटी के परिवार का नाम राजस्व रिकॉर्ड में भूमिधर के रूप में दर्ज होने के बाद इतनी लंबी देरी से रद्दीकरण की कार्यवाही शुरू करना ‘कानून की प्रक्रिया का पूरी तरह दुरुपयोग’ है।

Sonali11 सित. 2026, 07:48 PM IST
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26 साल बाद जमीन का आवंटन रद्द करना ‘कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग’, इलाहाबाद HC ने परिवार का हक बहाल किया


इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 1987 में किए गए कृषि भूमि के आवंटन को करीब 26 साल बाद रद्द करने की कार्रवाई को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करार दिया है। कोर्ट ने कहा कि जब आवंटी के पिता का नाम राजस्व अभिलेखों में पहले गैर-हस्तांतरणीय अधिकार वाले भूमिधर और बाद में हस्तांतरणीय अधिकार वाले भूमिधर के रूप में दर्ज किया जा चुका था, तब इतने लंबे अंतराल के बाद आवंटन रद्द करने की कार्यवाही शुरू करना उचित नहीं था। न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ता के परिवार को राहत दी। कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर गौर किया कि भूमि का आवंटन वर्ष 1987 में किया गया था, जबकि उसे रद्द करने की कार्यवाही वर्ष 2013 में शुरू हुई। यानी आवंटन के लगभग 26 वर्ष बाद निजी शिकायत के आधार पर इस प्रक्रिया को शुरू किया गया।


मामला उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 198(4) के तहत किए गए भूमि आवंटन से संबंधित था। याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पिता को वर्ष 1987 में कृषि भूमि आवंटित की गई थी। आवंटन के बाद उनका नाम राजस्व रिकॉर्ड में भूमिधर के रूप में दर्ज किया गया। शुरुआत में उन्हें गैर-हस्तांतरणीय अधिकार वाले भूमिधर के रूप में दर्ज किया गया और बाद में हस्तांतरणीय अधिकार वाले भूमिधर के रूप में भी दर्ज कर दिया गया। इसके बावजूद वर्ष 2013 में इस पुराने आवंटन को रद्द करने की कार्यवाही शुरू की गई। इस कार्रवाई को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम की धारा 198(6) में निर्धारित समय-सीमा पर भी ध्यान दिया। इस प्रावधान में आवंटन रद्द करने की कार्यवाही के लिए कारण बताओ नोटिस जारी करने की अधिकतम अवधि निर्धारित की गई है। 


कोर्ट ने बताया कि 10 नवंबर 1980 से पहले किए गए आवंटनों के मामले में संबंधित तारीख से सात साल के भीतर नोटिस जारी किया जाना चाहिए। वहीं 10 नवंबर 1980 या उसके बाद किए गए आवंटन के मामलों में आवंटन या पट्टे की तारीख से पांच साल के भीतर अथवा 10 नवंबर 1987 तक, जो भी बाद में हो, उस अवधि में कार्रवाई की जानी चाहिए। मौजूदा मामले में वर्ष 1987 के आवंटन के खिलाफ वर्ष 2013 में कार्यवाही शुरू की गई थी। हाईकोर्ट ने माना कि यह कार्रवाई निर्धारित समय-सीमा से बहुत अधिक देरी के बाद शुरू हुई। कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण माना कि इतने वर्षों के दौरान आवंटी के पिता का नाम राजस्व अभिलेखों में भूमिधर के रूप में दर्ज हो चुका था और बाद में उन्हें हस्तांतरणीय अधिकार भी मिल चुके थे।


न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय ने टिप्पणी की कि जब आवंटन के बाद आवंटी का अधिकार राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो चुका था, तब 26 साल बाद उस आवंटन को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू करना कानून की प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग है। कोर्ट ने इस देरी को सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं माना, बल्कि इसे ‘टोटल एब्यूज ऑफ प्रोसेस ऑफ लॉ’ यानी कानून की प्रक्रिया का पूरी तरह दुरुपयोग बताया। हाईकोर्ट के इस फैसले से याचिकाकर्ता के परिवार को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने पुराने आवंटन के आधार पर परिवार के भूमि अधिकार को बहाल कर दिया। फैसले में यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि भूमि आवंटन से जुड़े अधिकारों पर कार्रवाई करते समय संबंधित कानून में निर्धारित समय-सीमा का पालन जरूरी है और दशकों पुराने मामले को अचानक उठाकर आवंटी के अधिकारों को प्रभावित नहीं किया जा सकता। यह फैसला उत्तर प्रदेश में पुराने भूमि आवंटन, भूमिधर अधिकार और राजस्व रिकॉर्ड से जुड़े मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।