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सड़क पर दो लोगों का आपस में जोर-जोर से चिल्लाना अपराध नहीं, बॉम्बे HC ने FIR की रद्द; ₹10 हजार का लगाया खर्च

सड़क पर दो लोगों का शराब के नशे में एक-दूसरे से जोर-जोर से चिल्लाना अपने आप में अपराध नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक अश्लीलता, अनैतिक व्यवहार या किसी तीसरे व्यक्ति को परेशान करने जैसी ठोस बात सामने न हो, केवल तेज आवाज में बहस को महाराष्ट्र निषेध अधिनियम की धारा 85(1) के तहत संज्ञेय अपराध नहीं माना जा सकता।

Sonali11 सित. 2026, 07:48 PM IST
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सड़क पर दो लोगों का आपस में जोर-जोर से चिल्लाना अपराध नहीं, बॉम्बे HC ने FIR की रद्द; ₹10 हजार का लगाया खर्च


सार्वजनिक सड़क पर शराब के नशे में दो लोगों का एक-दूसरे से जोर-जोर से चिल्लाकर बात करना अपने आप में संज्ञेय अपराध नहीं है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने महाराष्ट्र निषेध अधिनियम, 1949 की धारा 85(1) के तहत दर्ज FIR को रद्द करते हुए कहा कि केवल तेज आवाज में एक-दूसरे पर चिल्लाने के आरोप से अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल शराब का सेवन करना भी इस धारा के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, बल्कि मामले के तथ्यों से अनुचित या अव्यवस्थित व्यवहार सामने आना जरूरी है। न्यायमूर्ति मिलिंद एन. जाधव ने यह फैसला दो आरोपियों की ओर से दायर याचिका पर सुनाया। दोनों ने पिंपरी पुलिस स्टेशन में उनके खिलाफ दर्ज FIR और उसके आधार पर दाखिल चार्जशीट को रद्द करने की मांग की थी।


मामले में अभियोजन का आरोप था कि दोनों आरोपी शराब के नशे में सार्वजनिक सड़क पर एक-दूसरे से जोर-जोर से चिल्ला रहे थे। पुलिस के अनुसार, उनके इस व्यवहार से सार्वजनिक शांति भंग हुई और आम लोगों को परेशानी हुई। इसी आधार पर महाराष्ट्र निषेध अधिनियम की धारा 85(1) के तहत मामला दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट ने FIR और चार्जशीट में लगाए गए आरोपों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन की ओर से यह आरोप नहीं लगाया गया था कि दोनों आरोपियों ने किसी तीसरे व्यक्ति पर चिल्लाकर उसे परेशान किया या उनके व्यवहार से वास्तव में सार्वजनिक शांति भंग हुई। अदालत ने यह भी पाया कि मामले में दोनों आरोपियों के एक-दूसरे से जोर-जोर से चिल्लाने के अलावा अश्लीलता, अनैतिकता या नैतिक रूप से आपत्तिजनक व्यवहार से संबंधित कोई विशेष आरोप नहीं था।


कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि दो व्यक्ति शराब के प्रभाव में थे और एक-दूसरे पर जोर-जोर से चिल्ला रहे थे, महाराष्ट्र निषेध अधिनियम की धारा 85(1) के तहत संज्ञेय अपराध नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि शराब का सेवन अपने आप में इस प्रावधान के तहत अपराध नहीं है। किसी व्यक्ति का व्यवहार वास्तव में अनुचित या अव्यवस्थित था या नहीं, इसका निर्धारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध आरोपों को उनके मूल रूप में पढ़ने पर भी आरोपियों के खिलाफ संज्ञेय अपराध बनता हुआ नजर नहीं आता। ऐसी स्थिति में FIR को जारी रखना आरोपियों को अनावश्यक आपराधिक कार्यवाही में उलझाने के समान होगा। अदालत ने इस मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि जहां आपराधिक कार्यवाही दुर्भावना से शुरू की गई हो या आरोपी को परेशान करने के उद्देश्य से जारी रखी जा रही हो, वहां हाईकोर्ट न्याय के हित में हस्तक्षेप कर सकता है और ऐसी कार्यवाही को समाप्त कर सकता है।


कोर्ट ने सहमति के आधार पर FIR रद्द करने वाले मामलों में न्यायिक संसाधनों की बर्बादी पर भी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बहुमूल्य न्यायिक समय और सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है, जबकि यही समय वास्तविक मुकदमों की सुनवाई में लगाया जा सकता था। इस तरह के मामले न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ बढ़ाते हैं और लंबित मामलों की संख्या को भी प्रभावित करते हैं। हालांकि, FIR रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को ₹10,000 का खर्च जमा करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही अदालत ने उनके खिलाफ दर्ज FIR और उससे जुड़ी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला यह स्पष्ट करता है कि हर तरह का सार्वजनिक विवाद या ऊंची आवाज में बहस अपने आप में आपराधिक मामला नहीं बन जाती। किसी व्यक्ति के खिलाफ महाराष्ट्र निषेध अधिनियम के तहत कार्रवाई के लिए केवल शराब के सेवन का आरोप पर्याप्त नहीं है, बल्कि कानून में बताए गए अपराध के आवश्यक तत्वों का तथ्यों से सामने आना जरूरी है।