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चोरी का अपराध कबूल किया तो कल्याण कोर्ट ने सुनाई 9 महीने की सजा, आरोपी ने खुद स्वीकार किया गुनाह
चोरी के मामले में आरोपी ने कोर्ट के सामने खुद अपना अपराध कबूल कर लिया। कल्याण की न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, तृतीय अदालत ने स्वैच्छिक दोष स्वीकारोक्ति को मान्य मानते हुए राहुल शिवाजी राठोड़ को भारतीय न्याय संहिता की धारा 303(2) के तहत दोषी ठहराया और 9 महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने 26 जून 2026 से हिरासत में बिताई गई अवधि को भी सजा में समायोजित करने का आदेश दिया।

भारतीय न्याय संहिता की धारा 303(2) के तहत दर्ज चोरी के मामले में कल्याण की अदालत ने आरोपी राहुल शिवाजी राठोड़ को दोषी ठहराते हुए 9 महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। सुनवाई के दौरान आरोपी ने अदालत के सामने स्वेच्छा से अपना अपराध स्वीकार किया। कोर्ट ने उसकी दोष स्वीकारोक्ति को बिना किसी दबाव या जबरदस्ती के दिया गया मानते हुए स्वीकार कर लिया और दोषसिद्धि के बाद सजा सुनाई। यह फैसला 10 सितंबर 2026 को कल्याण के न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, तृतीय न्यायालय में सुनाया गया। मामले की अध्यक्षता न्यायिक दंडाधिकारी निलेश पी. वासाडे ने की। प्रकरण आरसीसी नंबर 847/2026 था, जिसमें महाराष्ट्र सरकार की ओर से मानपाड़ा पुलिस स्टेशन के माध्यम से अभियोजन चलाया गया।
डोंबिवली पूर्व का रहने वाला है आरोपी
न्यायालय के आदेश के अनुसार आरोपी राहुल शिवाजी राठोड़ की उम्र 27 वर्ष है। वह डोंबिवली पूर्व के म्हात्रे नगर क्षेत्र में रहता है। उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 303(2) के तहत मामला दर्ज किया गया था। रिकॉर्ड के मुताबिक यह मामला 25 अगस्त 2026 को अदालत में प्राप्त और पंजीकृत हुआ था। 10 सितंबर 2026 को अदालत ने मामले का फैसला सुना दिया। यानी रिकॉर्ड के अनुसार मामले के पंजीकरण से निर्णय तक लगभग 16 दिन का समय लगा।
आरोपी ने खुद कबूल किया अपराध
मामले की सुनवाई के दौरान आरोपी ने अदालत के समक्ष मौखिक रूप से दोष स्वीकार करने की इच्छा जताई। इसके साथ ही उसकी ओर से इस संबंध में लिखित पावती भी अदालत के रिकॉर्ड पर दाखिल की गई। इसके बाद अदालत ने सबसे पहले यह जांचा कि आरोपी की दोष स्वीकारोक्ति स्वेच्छा से की गई है या उस पर किसी प्रकार का दबाव बनाया गया है। न्यायिक दंडाधिकारी ने आदेश में दर्ज किया कि आरोपी की दोष स्वीकारोक्ति वास्तविक प्रतीत होती है और उसके पीछे किसी प्रकार की जबरदस्ती या दबाव नहीं था। स्वैच्छिक दोष स्वीकारोक्ति को स्वीकार करने के बाद कोर्ट ने आरोपी को धारा 303(2) BNS के तहत दोषी करार दिया।
सजा से पहले आरोपी ने मांगी नरमी
दोषसिद्धि के बाद अदालत ने सजा की मात्रा तय करने के लिए आरोपी को सुनवाई का अवसर दिया। आरोपी की ओर से अदालत से नरमी बरतने का अनुरोध किया गया। वहीं सरकारी पक्ष की ओर से मामले में उचित सजा दिए जाने की मांग की गई। अदालत ने रिकॉर्ड में यह भी देखा कि आरोपी 26 जून 2026 से हिरासत में था। मामले की प्रकृति और उपलब्ध परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने उसे 9 महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई।
हिरासत में बिताया समय सजा में समायोजित
अदालत ने आरोपी को पहले से हिरासत में बिताई गई अवधि का लाभ भी दिया। आदेश के मुताबिक 26 जून 2026 से 10 सितंबर 2026 तक हिरासत में बिताई गई अवधि को धारा 428 आपराधिक प्रक्रिया संहिता के तहत सेट-ऑफ किया गया। यानी आरोपी को पहले से जेल में बिताई गई अवधि को उसकी सजा की अवधि में समायोजित करने का लाभ दिया गया।
जब्त सामान मूल मालिक को सौंपने का आदेश
अदालत ने चार्जशीट में दर्ज मुद्देमाल यानी जब्त सामान के संबंध में भी निर्देश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि उसे नियमों के अनुसार उसके मूल मालिक को स्थायी रूप से सौंप दिया जाए। हालांकि यह कार्रवाई अपील की अवधि समाप्त होने और संबंधित औपचारिकताओं के अधीन रहेगी। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि यदि कोई क्षतिपूर्ति बांड मौजूद है तो अपील की अवधि समाप्त होने के बाद उसे नियमों के अनुसार रद्द किया जाए।
10 सितंबर को खुले न्यायालय में सुनाया फैसला
न्यायिक दंडाधिकारी निलेश पी. वासाडे ने 10 सितंबर 2026 को खुले न्यायालय में फैसला सुनाया। अदालत ने आरोपी को फैसले की प्रति भी नियमानुसार निशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश दिया। इस मामले की खास बात यह रही कि आरोपी ने खुद अदालत के समक्ष दोष स्वीकार किया और कोर्ट ने उसकी स्वीकारोक्ति को स्वैच्छिक मानते हुए उसे दोषी ठहराया। इसके बाद अदालत ने 9 महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई और हिरासत में पहले से बिताए समय का कानूनी लाभ भी प्रदान किया।
