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19 साल पुराने चोरी के प्रयास का केस खत्म, गवाह ही कोर्ट नहीं पहुंचे; कल्याण कोर्ट ने आरोपी को किया बरी
2007 में दुकान का ताला तोड़कर चोरी की कोशिश के आरोप में दर्ज मामला करीब 19 साल बाद खत्म हो गया। कल्याण की अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी को कोर्ट में पेश ही नहीं कर सका। पर्याप्त सबूत नहीं मिलने पर आरोपी बाबूराम सिब्रत बिंद को दोनों आरोपों से बरी कर दिया गया।

कल्याण न्यायालय ने करीब 19 साल पुराने चोरी के प्रयास के मामले में आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। मामला वर्ष 2007 में डोंबिवली पूर्व स्थित एक दुकान का ताला तोड़कर चोरी करने की कथित कोशिश से जुड़ा था। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। खास बात यह रही कि मामले के शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी समेत प्रमुख गवाहों को बार-बार समन जारी किए जाने के बावजूद वे न्यायालय के सामने पेश नहीं हुए। यह फैसला न्यायदंडाधिकारी प्रथम श्रेणी, न्यायालय क्रमांक 3, कल्याण के पीठासीन अधिकारी निलेश प्रभाकर वासाडे ने 10 सितंबर 2026 को सुनाया। मामला नियमित फौजदारी खटला क्रमांक 331/2007 और मानपाड़ा पुलिस स्टेशन के अपराध क्रमांक I-146/2007 से संबंधित था।
मामले के अनुसार, 30 मई 2007 को दोपहर करीब 2:30 बजे डोंबिवली पूर्व की शंकेश्वर बिल्डिंग, सी विंग स्थित विशाल पावर लॉन्ड्री में शिकायतकर्ता भैय्यालाल सीताराम कनोजिया की दुकान का बंद शटर था। अभियोजन का आरोप था कि आरोपी बाबूराम सिब्रत बिंद दुकान के शटर का ताला एक्सा ब्लेड से काटते हुए पकड़ा गया और उसने दुकान में चोरी करने की कोशिश की। शिकायत मिलने के बाद मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जांच के दौरान घटनास्थल का पंचनामा तैयार किया, आरोपी को गिरफ्तार किया और दो पंचों की मौजूदगी में कथित तौर पर ताला तथा एक्सा ब्लेड जब्त किया। इसके बाद पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 457 और 380 के तहत आरोपपत्र दाखिल किया। आरोपी के खिलाफ 25 जून 2009 को आरोप तय किए गए। आरोपी ने आरोपों से इनकार करते हुए मुकदमे का सामना करने की मांग की। इसके बाद मामले में साक्ष्य की प्रक्रिया शुरू हुई, लेकिन अभियोजन पक्ष के लिए प्रमुख गवाहों को न्यायालय में पेश करना मुश्किल साबित हुआ।
अदालत ने अपने फैसले में बताया कि अभियोजन पक्ष शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी को कोर्ट में हाजिर नहीं करा सका। इन गवाहों को कई बार समन जारी किए गए, लेकिन वे न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए। अंत में समन की तामील कराने वाले पुलिस कर्मचारी आनंद दगडू बाशिंगे को गवाह के रूप में पेश किया गया।
इस पुलिस कर्मचारी ने अदालत को बताया कि वह वर्ष 2021 से मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में समन बजाने का काम कर रहा है। उसने संबंधित पते पर जाकर शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों को समन देने का प्रयास किया, लेकिन वे वहां नहीं मिले। इसके बाद उसने इसकी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की। अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध इस साक्ष्य से आरोपी के खिलाफ अपराध साबित करने वाला पर्याप्त प्रमाण सामने नहीं आया। अभियोजन पक्ष दोनों आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
न्यायालय ने कहा कि आरोपी के खिलाफ दोष सिद्ध करने योग्य पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने के कारण उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसके बाद अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 457 और 380 के तहत आरोपों से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत निर्दोष मुक्त कर दिया। अदालत ने आरोपी और जमानतदार के बंधपत्र रद्द करने का आदेश दिया। साथ ही भविष्य में अपील होने की स्थिति में उपस्थित रहने के लिए धारा 437-A के तहत जमानत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। इस मामले में जब्त किया गया ताला और एक्सा ब्लेड भी अब मूल्यहीन हो चुके थे। अदालत ने अपील की अवधि समाप्त होने के बाद नियमानुसार इनकी निस्तारण प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया। लगभग 19 साल बाद आए इस फैसले में एक बार फिर यह सामने आया कि आपराधिक मामले में केवल आरोप या FIR पर्याप्त नहीं होती। अभियोजन पक्ष को आरोपों को न्यायालय के सामने विश्वसनीय साक्ष्यों और गवाहों के जरिए साबित करना होता है। इस मामले में प्रमुख गवाहों की गैरमौजूदगी के कारण अभियोजन आरोपी के खिलाफ अपना मामला साबित नहीं कर सका और अंततः उसे बरी कर दिया गया।
