law-order
नाबालिग के अपहरण और POCSO केस में आरोपी बरी, पीड़िता ने ही अभियोजन की कहानी नकारी; कल्याण विशेष अदालत का बड़ा फैसला
कल्याण की विशेष POCSO अदालत ने नाबालिग के अपहरण और यौन उत्पीड़न के आरोप में आरोपी मयूर संजय जाधव को बरी कर दिया। अदालत ने पाया कि पीड़िता और उसके माता-पिता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया और आरोपी के खिलाफ अपहरण या यौन उत्पीड़न का आरोप साबित नहीं हो सका। 10 सितंबर 2026 को सुनाए गए फैसले में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।

ठाणे के कल्याण स्थित विशेष POCSO अदालत ने नाबालिग लड़की के कथित अपहरण और यौन उत्पीड़न के मामले में आरोपी मयूर संजय जाधव को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को ठोस साक्ष्य से साबित नहीं कर सका। मुकदमे के दौरान पीड़िता और उसके माता-पिता ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। पीड़िता ने अदालत में आरोपी द्वारा अपहरण या यौन उत्पीड़न किए जाने से इनकार किया। विशेष न्यायाधीश (POCSO) लक्ष्मीकांत ए. बिडवई ने 10 सितंबर 2026 को Spl. Case No.132/2021 में यह फैसला सुनाया। मामला कसारा पुलिस स्टेशन में दर्ज Crime No.59/2021 से संबंधित था। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 363 और POCSO Act की धारा 8 के तहत आरोप लगाए गए थे।
क्या था पूरा मामला?
अभियोजन के अनुसार, 9 अप्रैल 2021 की शाम करीब 7:45 बजे 14 वर्षीय लड़की घर से 10 रुपये लेकर कुछ खाने का सामान खरीदने के लिए निकली थी। काफी देर तक उसके घर वापस नहीं लौटने पर उसके माता-पिता ने उसकी तलाश शुरू की। जब उसका कोई पता नहीं चला तो पिता ने कसारा पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई और आशंका जताई कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने लड़की का अपहरण कर लिया है। पुलिस ने इस मामले में Crime No.59/2021 दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान मोबाइल टावर लोकेशन के आधार पर पुलिस ने लड़की की लोकेशन येवला, नासिक में ट्रेस की। पुलिस टीम वहां पहुंची तो लड़की आरोपी के साथ मिली और दोनों को कसारा पुलिस स्टेशन लाया गया। जांच में पुलिस ने दावा किया कि आरोपी और लड़की एक-दूसरे को स्कूल के समय से जानते थे। अभियोजन के अनुसार आरोपी ने लड़की से शादी करने का भरोसा दिलाया और उसे अपने साथ चलने के लिए कहा था। इसके बाद दोनों गांव से निकलकर आरोपी के येवला स्थित घर पहुंचे। बाद में आरोपी के खिलाफ POCSO Act की धारा 8 भी जोड़ी गई। पुलिस ने लड़की का बयान दर्ज किया, मेडिकल जांच कराई, जन्म प्रमाणपत्र हासिल किया और उसका बयान मजिस्ट्रेट के सामने धारा 164 CrPC के तहत दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की।
पीड़िता की उम्र को लेकर क्या कहा कोर्ट ने?
अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद जन्म प्रमाणपत्र को भी देखा। प्रमाणपत्र के अनुसार पीड़िता का जन्म 25 जुलाई 2006 को हुआ था। घटना 9 अप्रैल 2021 की थी। अदालत ने गणना के आधार पर माना कि घटना के समय पीड़िता की उम्र 14 वर्ष 8 महीने 15 दिन थी। यानी वह घटना के समय नाबालिग थी और POCSO Act के प्रावधान लागू होते थे।
हालांकि, केवल पीड़िता के नाबालिग होने से आरोपी को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं था। अभियोजन को यह भी साबित करना था कि आरोपी ने उसके खिलाफ लगाए गए अपहरण और यौन उत्पीड़न के आरोप किए थे।
कोर्ट में बदल गया पीड़िता का बयान
मुकदमे के दौरान पीड़िता ने अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। उसने अदालत में कहा कि वह आरोपी के साथ शिर्डी गई थी और अपने माता-पिता को बताए बिना जाने के कारण गलतफहमी में उसके पिता ने पुलिस शिकायत दर्ज कराई। अभियोजन ने पीड़िता के धारा 164 CrPC के पहले बयान को लेकर उससे सवाल किए। उसने उस बयान पर अपने हस्ताक्षर स्वीकार किए, लेकिन उसके अंदर दर्ज सामग्री को स्वीकार नहीं किया। अभियोजन की ओर से सवाल किए जाने के बावजूद उसने आरोपी द्वारा उसके अपहरण या यौन उत्पीड़न किए जाने से इनकार किया।
माता-पिता ने भी आरोपों का समर्थन नहीं किया
पीड़िता के पिता ने अदालत में बताया कि बेटी के काफी देर तक घर नहीं लौटने पर उन्होंने उसकी तलाश की और बाद में शिकायत दर्ज कराई। जिरह के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि आरोपी के खिलाफ लड़की के अपहरण, यौन उत्पीड़न या उसे परेशान करने को लेकर उनकी कोई शिकायत नहीं है। पीड़िता की मां ने भी अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया। उन्होंने आरोपी द्वारा लड़की का अपहरण करने या उसे येवला में रोककर रखने के आरोप से इनकार किया।
अभियोजन आरोप साबित करने में रहा विफल
अदालत ने अभियोजन के तीन प्रमुख गवाहों—पीड़िता के पिता, स्वयं पीड़िता और उसकी मां—के बयान पर विचार किया। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन के साक्ष्य को उसके मूल रूप में देखने पर भी यह साबित नहीं होता कि आरोपी ने 9 अप्रैल 2021 को लड़की का अपहरण किया या उसके साथ यौन उत्पीड़न अथवा यौन हमला किया। अदालत ने यह भी नोट किया कि पीड़िता की मेडिकल जांच से संबंधित रिकॉर्ड में केवल OPD पेपर मौजूद था और उसे अभियोजन ने विधिवत साबित नहीं किया था। कोर्ट ने यह भी माना कि जिस स्थान का पंचनामा तैयार किया गया था, वह शिकायतकर्ता के घर का था, जबकि अभियोजन की कहानी के अनुसार आरोपी और पीड़िता की मुलाकात Bikaner Sweet Mart के पास हुई थी। इन परिस्थितियों में अदालत ने माना कि अभियोजन आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
आरोपी को दोनों आरोपों से बरी किया
विशेष POCSO अदालत ने मयूर संजय जाधव को IPC की धारा 363 और POCSO Act की धारा 8 के तहत आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने उसके बेल बॉन्ड रद्द कर दिए और जमानतदारों को मुक्त कर दिया। साथ ही CrPC की धारा 437-A के अनुपालन के लिए आरोपी को 25,000 रुपये का व्यक्तिगत बॉन्ड और इतनी ही राशि का जमानतदार प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। इस फैसले का आधार यह नहीं था कि पीड़िता नाबालिग नहीं थी। अदालत ने स्पष्ट रूप से माना कि घटना के समय उसकी उम्र 18 वर्ष से कम थी। आरोपी को इसलिए बरी किया गया क्योंकि अभियोजन यह साबित नहीं कर सका कि आरोपी ने उसके खिलाफ लगाए गए अपहरण और POCSO के आरोप वास्तव में किए थे।
