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यूपी सरकार Goondas Act को ‘दमन का हथियार’ बना रही? इलाहाबाद HC की कड़ी टिप्पणी, गोंडा निवासी पर कार्रवाई रद्द
उत्तर प्रदेश में Goondas Act के इस्तेमाल को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे लगता है कि राज्य इस कानून को “दमन के हथियार” के रूप में इस्तेमाल करने पर अड़ा हुआ है। गोंडा निवासी के खिलाफ की गई कार्रवाई को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति को केवल पुराने आपराधिक मामलों या कमजोर पुलिस रिपोर्ट के आधार पर ‘गुंडा’ घोषित नहीं किया जा सकता।

प्रयागराज/लखनऊ।
उत्तर प्रदेश में अपराध नियंत्रण के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले Goondas Act को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन के रवैये पर बेहद कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि राज्य सरकार Goondas Act को ‘दमन के हथियार’ के तौर पर इस्तेमाल करने के अपने रवैये पर कायम है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह कानून किसी व्यक्ति को बिना किसी गंभीर अपराध में दोषसिद्धि के दंडित करने के लिए नहीं है।
न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने गोंडा निवासी जाहिद अली के खिलाफ पारित Goondas Act के तहत कार्रवाई को रद्द कर दिया। जिला मजिस्ट्रेट, गोंडा ने 11 मई 2026 को उत्तर प्रदेश नियंत्रण गुंडा अधिनियम, 1970 की धारा 3(1) के तहत जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करते हुए उसे छह महीने के लिए गोंडा जिले की सीमा से बाहर करने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ दायर अपील को देवीपाटन मंडल के आयुक्त ने 12 अगस्त 2026 को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों को कानून की नजर में टिकाऊ नहीं माना और रद्द कर दिया।
दो पुराने मामलों के आधार पर घोषित किया ‘गुंडा’
जिला मजिस्ट्रेट के आदेश में जाहिद अली की कथित संलिप्तता दो आपराधिक मामलों और एक बीट सूचना रिपोर्ट के आधार पर बताई गई थी। इनमें एक मामला वर्ष 2010 का और दूसरा वर्ष 2020 का था। हालांकि, 2010 के मामले में जाहिद अली को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गोंडा ने 26 अगस्त 2017 को ही बरी कर दिया था। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को बेहद महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज मामले में उसके बरी हो जाने के बाद उसी मामले में उसकी संलिप्तता को आधार बनाकर उसे ‘गुंडा’ घोषित नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी पाया कि 2010 के मामले में हुई बरी के बावजूद पुलिस रिपोर्ट में उसका उल्लेख किया गया।
2020 के केस और 2026 की कार्रवाई में नहीं था उचित संबंध
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 2020 में दर्ज आपराधिक मामले के आधार पर वर्ष 2026 में जाहिद अली के खिलाफ Goondas Act की कार्रवाई की गई। अदालत के मुताबिक इन दोनों घटनाओं के बीच लगभग छह साल का अंतर था और इस दौरान ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं रखा गया, जिससे यह साबित हो कि याचिकाकर्ता की गतिविधियां सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बनी हुई थीं। हाईकोर्ट ने कहा कि 2020 में दर्ज मामले और छह साल बाद उसे ‘गुंडा’ घोषित करने के बीच कोई उचित संबंध यानी ‘रीजनबल नेक्सस’ नहीं था। कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल एक आपराधिक मामले में कथित संलिप्तता से यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति आदतन अपराध करता है या अपराध करने का प्रयास करता है।
पुलिस रिपोर्ट पर भी उठे सवाल
अदालत ने पुलिस की रिपोर्ट में पहले ही बरी हो चुके 2010 के मामले को शामिल किए जाने पर भी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि पुलिस को इस तथ्य की जानकारी होनी चाहिए थी कि जाहिद अली उस मामले में 2017 में बरी हो चुका था। इसके बावजूद उस मामले का रिपोर्ट में उल्लेख किया जाना कोर्ट के अनुसार याचिकाकर्ता की जिला मजिस्ट्रेट के सामने गलत तस्वीर पेश करने जैसा था।
बीट सूचना रिपोर्ट भी पर्याप्त आधार नहीं
Goondas Act की कार्रवाई के लिए इस्तेमाल की गई बीट सूचना रिपोर्ट को भी हाईकोर्ट ने पर्याप्त आधार नहीं माना। अदालत ने पाया कि इस सूचना के आधार पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ था और न ही याचिकाकर्ता को इस संबंध में अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी रिपोर्ट, जिस पर संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया हो, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और केवल उसके आधार पर किसी व्यक्ति को ‘गुंडा’ घोषित नहीं किया जा सकता।
‘Goondas Act का इस्तेमाल बहुत सावधानी से हो’
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दोहराया कि Goondas Act एक शक्तिशाली कानून है, लेकिन इसका इस्तेमाल बहुत सीमित और स्पष्ट मामलों में ही किया जाना चाहिए, जहां सार्वजनिक अव्यवस्था या सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने की वास्तविक आवश्यकता हो। कोर्ट ने कहा कि इस कानून का इस्तेमाल निर्दोष लोगों के उत्पीड़न के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जो यह दिखाते हैं कि राज्य Goondas Act को ‘दमन के हथियार’ के रूप में इस्तेमाल करने के अपने रवैये पर कायम है और मौजूदा मामला कानून के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है।
दोनों आदेश रद्द
अंततः हाईकोर्ट ने जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने और छह महीने के लिए गोंडा जिले से बाहर करने वाले जिला मजिस्ट्रेट के आदेश के साथ-साथ आयुक्त के अपीलीय आदेश को भी रद्द कर दिया। कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए दोनों आदेशों को कानून की नजर में अस्थिर माना। यह मामला Zahid Ali बनाम State of U.P. के नाम से दर्ज है
