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‘लोगों को प्रदर्शन करने से कैसे रोक सकते हैं? हम लोकतंत्र हैं’, मनोज जरांगे के ‘मुंबई मार्च’ पर बॉम्बे HC की दो टूक
‘March to Mumbai’ को लेकर मनोज जरांगे-पाटिल को रोकने की मांग पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने लोकतांत्रिक अधिकारों की अहमियत पर जोर दिया। कोर्ट ने कहा, “हम लोकतंत्र हैं, लोगों को प्रदर्शन करने से कैसे रोक सकते हैं?” पीठ ने साफ किया कि अपनी मांगों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन करना मौलिक अधिकार है।

मुंबई।
मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे-पाटिल के ‘March to Mumbai’ आह्वान को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। चीफ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की डिवीजन बेंच ने कहा कि भारत एक लोकतंत्र है और लोगों को प्रदर्शन करने से कैसे रोका जा सकता है। अदालत ने कहा कि अपनी मांगों को लेकर आंदोलन करना और विरोध दर्ज कराना मौलिक अधिकार है। हाईकोर्ट के सामने एक याचिका पर सुनवाई हो रही थी, जिसमें मनोज जरांगे-पाटिल के मुंबई मार्च के संबंध में आवश्यक निर्देश जारी करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से मार्च के कारण संभावित कानून-व्यवस्था और यातायात संबंधी समस्याओं को लेकर अदालत का हस्तक्षेप मांगा गया था।
‘विरोध करना मौलिक अधिकार’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया कि किसी व्यक्ति या समूह को शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने से कैसे रोका जा सकता है। पीठ ने कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और नागरिकों को अपनी मांगों के समर्थन में आवाज उठाने तथा आंदोलन करने का अधिकार है। अदालत की टिप्पणी का मूल आधार यह था कि शांतिपूर्ण विरोध और अपनी मांगों को सरकार तक पहुंचाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रदर्शनकारियों को कानून का उल्लंघन करने या सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित करने की खुली छूट मिल जाती है।
मनोज जरांगे ने मुंबई मार्च का आह्वान किया था
मराठा आरक्षण की मांग को लेकर मनोज जरांगे-पाटिल लंबे समय से आंदोलन कर रहे हैं। उनके नेतृत्व में होने वाले प्रस्तावित ‘March to Mumbai’ को लेकर प्रशासन और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवाल उठाए गए थे। याचिका में अदालत से ऐसे निर्देश देने की मांग की गई थी, जिससे मार्च के दौरान किसी तरह की अव्यवस्था या सार्वजनिक परेशानी की स्थिति पैदा न हो।
कोर्ट ने लोकतांत्रिक अधिकार पर दिया जोर
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट करने पर जोर दिया कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध का अपना महत्व है। कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई प्रदर्शन या मार्च प्रशासन के लिए चुनौती पैदा कर सकता है, नागरिकों के विरोध के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता। हालांकि, प्रदर्शन के अधिकार के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। सार्वजनिक सड़कों, यातायात, आम नागरिकों की आवाजाही और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली स्थिति में प्रशासन आवश्यक कदम उठा सकता है।
कानून-व्यवस्था और मौलिक अधिकार के बीच संतुलन इस मामले में हाईकोर्ट के सामने एक अहम सवाल यह भी है कि प्रदर्शन करने के मौलिक अधिकार और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अदालत की टिप्पणी से संकेत मिलता है कि किसी लोकतांत्रिक आंदोलन को केवल प्रतिबंध के जरिए नियंत्रित करने के बजाय शांतिपूर्ण प्रदर्शन सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक उपायों पर भी विचार किया जाना चाहिए। फिलहाल हाईकोर्ट की टिप्पणी प्रदर्शन के अधिकार को लेकर थी। इसका यह अर्थ नहीं है कि मनोज जरांगे या उनके समर्थकों को किसी भी प्रकार की गतिविधि की बिना शर्त अनुमति मिल गई है। मार्च के दौरान लागू कानून, प्रशासनिक निर्देश और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े नियमों का पालन करना आवश्यक रहेगा। बॉम्बे हाईकोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक रूप से चर्चा में है। अदालत के सामने अब चुनौती यह है कि प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार की रक्षा करते हुए आम नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था भी सुनिश्चित की जाए।
