law-order

11 साल की बच्ची ने माता-पिता के साथ जाने से किया इनकार, बॉम्बे HC ने पड़ोसियों के पास ही रहने दिया; कहा- बच्चे की भलाई सबसे अहम

11 साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसके जैविक माता-पिता को देने से बॉम्बे हाईकोर्ट ने इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्ची करीब दो महीने की उम्र से पड़ोसियों के साथ रह रही है और उसने अपने जैविक माता-पिता के साथ जाने की पूरी तरह अनिच्छा जताई है। अदालत ने साफ किया कि कस्टडी के मामलों में माता-पिता का कानूनी अधिकार नहीं, बल्कि बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण है।

Sonali12 सित. 2026, 06:00 PM IST
खबर शेयर करें:
11 साल की बच्ची ने माता-पिता के साथ जाने से किया इनकार, बॉम्बे HC ने पड़ोसियों के पास ही रहने दिया; कहा- बच्चे की भलाई सबसे अहम

मुंबई। 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 11 साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी उसके जैविक माता-पिता को सौंपने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि बच्ची करीब दो महीने की उम्र से पड़ोसी दंपति के साथ रह रही है और वर्तमान में उन्हीं को अपने माता-पिता के रूप में देखती है। बच्ची ने अपने जैविक माता-पिता के साथ जाने की स्पष्ट अनिच्छा भी जताई थी।

जस्टिस एन.जे. जामदार ने कहा कि Guardians and Wards Act, 1890 के तहत कस्टडी से जुड़े मामलों में किसी अभिभावक का कानूनी अधिकार ही अंतिम कसौटी नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल बच्चे का कल्याण है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चे की इच्छा अपने आप में निर्णायक नहीं होती, लेकिन यदि बच्चा समझदारी से अपनी पसंद व्यक्त कर रहा है तो उसे पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।


क्या था पूरा मामला?

मामला Yogesh Gangaram Sanap बनाम Anil Mahadev Raghav से जुड़ा है। जैविक माता-पिता ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर जिला अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें बच्ची की अंतरिम कस्टडी उन्हें देने से इनकार किया गया था। माता-पिता का दावा था कि जब बच्ची लगभग तीन महीने की थी, तब उन्होंने उसे पड़ोसी दंपति के पास अस्थायी रूप से छोड़ा था। उनका कहना था कि पड़ोसी दंपति न तो बच्ची के रिश्तेदार हैं और न ही उसके वैध अभिभावक। वहीं, पड़ोसी दंपति का दावा था कि बच्ची उन्हें जनवरी 2015 में गोद दी गई थी। हालांकि, जैविक माता-पिता ने इस कथित गोद लेने का विरोध करते हुए कहा कि इसे साबित करने के लिए पर्याप्त कानूनी साक्ष्य मौजूद नहीं हैं। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि बच्ची को अपने बच्चे के रूप में दिखाने के लिए रिकॉर्ड में हेरफेर और गलत घोषणाएं की गईं।


बच्ची ने माता-पिता को पहचानने से भी इनकार किया

हाईकोर्ट ने बच्ची से बातचीत के दौरान उसकी प्रतिक्रिया को भी महत्वपूर्ण माना। कोर्ट के अनुसार, बच्ची ने याचिकाकर्ता जैविक माता-पिता के साथ जाने में पूरी तरह अनिच्छा दिखाई। यहां तक कि उसने उन्हें पहचानने से भी इनकार किया। कोर्ट ने माना कि यह रवैया संभव है कि पड़ोसी दंपति और जैविक माता-पिता के बीच विवाद के कारण उनके प्रभाव में विकसित हुआ हो। लेकिन अदालत ने साथ ही कहा कि तथ्य यह है कि बच्ची ने पड़ोसी दंपति के साथ रहने और जैविक माता-पिता के साथ न जाने की स्पष्ट इच्छा व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि बच्ची की इच्छा अंतिम फैसला नहीं है, लेकिन उसे महत्वहीन मानकर पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।


‘बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण’

हाईकोर्ट ने Guardians and Wards Act की धारा 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि बच्चे को कस्टडी में वापस दिलाने का सवाल केवल अभिभावक के कानूनी अधिकार से तय नहीं होता। इसमें बच्चे का कल्याण सबसे महत्वपूर्ण consideration है। कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत उस स्थिति में भी लागू होगा, जहां बच्चे की कस्टडी रखने वाला व्यक्ति उसका माता-पिता या कानूनी अभिभावक नहीं है। अदालत ने खास तौर पर बच्ची की उम्र, उसके लंबे समय से पड़ोसी दंपति के साथ रहने, वहां मिलने वाली स्थिरता और उसके द्वारा व्यक्त की गई पसंद को ध्यान में रखा।


‘दो महीने की उम्र से पड़ोसियों के साथ रह रही’

कोर्ट ने कहा कि बच्ची लगभग दो महीने की उम्र से पड़ोसी दंपति के साथ रह रही है। ऐसे में उसके लिए वही लोग बचपन से माता-पिता की भूमिका में रहे हैं। अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि याचिकाकर्ताओं ने करीब साढ़े चार साल तक बच्ची को अपने पास रखने या इस व्यवस्था पर आपत्ति जताने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि इस समय बच्ची की अंतरिम कस्टडी को अचानक बदलना उसके कल्याण के हित में नहीं होगा।


मुख्य कस्टडी विवाद पर अंतिम फैसला बाकी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि पड़ोसी दंपति के कथित गोद लेने या कस्टडी के दावे को अंतिम रूप से सही मान लिया गया है। इन सभी मुद्दों पर Guardians and Wards Act के तहत चल रही मुख्य कार्यवाही में फैसला किया जाना बाकी है। हाईकोर्ट ने जिला जज से मुख्य कस्टडी आवेदन पर जल्द फैसला करने का अनुरोध किया और इसे अधिमानतः छह महीने के भीतर तय करने को कहा। इस बीच जैविक माता-पिता को बच्ची से मिलने की अनुमति दी गई है। उन्हें प्रत्येक शुक्रवार और शनिवार को तीन घंटे बच्ची से मिलने का अधिकार रहेगा।


याचिका खारिज

इन परिस्थितियों में जस्टिस एन.जे. जामदार ने जैविक माता-पिता की अंतरिम कस्टडी की मांग वाली रिट याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने दोहराया कि कस्टडी के विवाद में सबसे ऊपर बच्चे का कल्याण है और मौजूदा परिस्थितियों में बच्ची को उस वातावरण से हटाना उसके हित में नहीं होगा, जिसमें वह शैशवावस्था से रह रही है।