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“Wisdom Teeth और Pubic Hair से नाबालिग साबित नहीं होती उम्र!” इलाहाबाद HC ने अपहरण केस में आरोपी को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण के एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए कहा कि Wisdom Teeth या Pubic Hair जैसे शारीरिक संकेतों से किसी लड़की की उम्र निश्चित रूप से साबित नहीं की जा सकती। कोर्ट ने माना कि अभियोजन नाबालिग होने का ठोस और विश्वसनीय सबूत पेश करने में नाकाम रहा।

Sonali12 सित. 2026, 06:01 PM IST
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“Wisdom Teeth और Pubic Hair से नाबालिग साबित नहीं होती उम्र!” इलाहाबाद HC ने अपहरण केस में आरोपी को किया बरी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपहरण के एक मामले में आरोपी को बरी करते हुए नाबालिग की उम्र निर्धारित करने के लिए केवल शारीरिक विकास के संकेतों पर निर्भर रहने के तरीके पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि Wisdom Teeth यानी अक्ल की दाढ़ या Pubic Hair यानी जननांगों के बालों की मौजूदगी किसी लड़की की उम्र को निश्चित रूप से साबित नहीं कर सकती। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति की उम्र निर्धारित करने के लिए वैज्ञानिक और विश्वसनीय दस्तावेजी साक्ष्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। केवल शारीरिक विशेषताओं के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित लड़की घटना के समय नाबालिग थी।


यह मामला उस आपराधिक मुकदमे से जुड़ा था जिसमें आरोपी पर लड़की के अपहरण और उससे संबंधित अपराधों के आरोप लगाए गए थे। अभियोजन पक्ष का मुख्य आधार यह था कि पीड़िता घटना के समय नाबालिग थी। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ गंभीर आपराधिक धाराओं में मुकदमा चलाया गया। हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए पाया कि अभियोजन पक्ष लड़की की उम्र को विश्वसनीय तरीके से साबित करने में सफल नहीं रहा। अदालत ने उम्र निर्धारण के लिए पेश किए गए मेडिकल या शारीरिक संकेतों को निर्णायक प्रमाण मानने से इनकार कर दिया। अदालत ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि Wisdom Teeth का निकलना या Pubic Hair का होना किसी व्यक्ति की निश्चित उम्र का प्रमाण नहीं है। इन शारीरिक विशेषताओं में व्यक्ति-व्यक्ति के बीच काफी अंतर हो सकता है। इसलिए इन्हें अकेले आधार बनाकर किसी व्यक्ति को नाबालिग घोषित करना उचित नहीं होगा।


कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मुकदमे में अभियोजन पर आरोपों को संदेह से परे साबित करने की जिम्मेदारी होती है। यदि किसी महत्वपूर्ण तथ्य, खासकर पीड़िता की उम्र, को लेकर पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं हैं, तो उसका लाभ आरोपी को मिलना चाहिए। हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि मामले में पीड़िता की उम्र से जुड़े दस्तावेजी साक्ष्यों और अन्य परिस्थितियों का मूल्यांकन किस तरह किया गया। अदालत ने माना कि केवल अनुमान या शारीरिक बनावट के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने आरोपी को अपहरण के मामले में दोषी ठहराए जाने के आधार को अस्थिर पाया और उसे बरी कर दिया। अदालत का यह फैसला उम्र निर्धारण से जुड़े आपराधिक मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि मेडिकल परीक्षण या शारीरिक परीक्षण का कोई महत्व नहीं है, बल्कि अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसे संकेतों को उम्र का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। उम्र साबित करने के लिए उपलब्ध विश्वसनीय दस्तावेजी और वैज्ञानिक साक्ष्यों का उचित मूल्यांकन जरूरी है।