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POCSO केस में शिक्षक को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत! छात्राओं को शारीरिक सजा देने पर दर्ज केस रद्द, कोर्ट ने बताई वजह

सुप्रीम कोर्ट ने POCSO केस में शिक्षक को बड़ी राहत देते हुए उसके खिलाफ दर्ज मामला रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि छात्राओं को शारीरिक सजा देना, बिना यौन मंशा के, POCSO Act के तहत अपराध नहीं बनता।

Sonali12 सित. 2026, 06:01 PM IST
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POCSO केस में शिक्षक को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत! छात्राओं को शारीरिक सजा देने पर दर्ज केस रद्द, कोर्ट ने बताई वजह

कोर्ट ने शिक्षक के व्यवहार को अनुचित और असंवेदनशील बताया, लेकिन कहा- POCSO की धारा 10 के अपराध के लिए जरूरी यौन मंशा रिकॉर्ड से सामने नहीं आती

सुप्रीम कोर्ट ने छात्राओं को शारीरिक सजा देने और अनुचित तरीके से छूने के आरोप में POCSO एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने कहा कि शिक्षक का व्यवहार अनुचित और छात्राओं के प्रति असंवेदनशील था, लेकिन उपलब्ध सामग्री से यह साबित नहीं होता कि उसके पीछे यौन मंशा थी। ऐसी स्थिति में POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत गंभीर यौन हमला का अपराध नहीं बनता।


मामला एक स्कूल शिक्षक से जुड़ा था, जिसके खिलाफ POCSO एक्ट की धारा 10 के तहत FIR दर्ज की गई थी। आरोप था कि शिक्षक ने कक्षा 10 की कुछ छात्राओं को शारीरिक रूप से छुआ था। स्कूल की महिला शिक्षकों को छात्राओं ने शिक्षक के व्यवहार की शिकायत की थी, जिसके बाद उन्होंने मामले की जानकारी प्रधानाध्यापक को दी।

इसके बाद जिला बाल संरक्षण इकाई यानी District Child Protection Unit ने स्कूल का दौरा किया और Counselling-cum-Enquiry Report तैयार की। इसी रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने स्वतः संज्ञान लेते हुए शिक्षक के खिलाफ FIR दर्ज की थी। रिपोर्ट में छात्राओं ने बताया था कि शिक्षक कक्षा में ध्यान नहीं देने पर उनकी ऊपरी पीठ पर मारता था। कुछ छात्राओं ने यह भी कहा कि शिक्षक का उनके शरीर के कुछ हिस्सों को छूने का तरीका उन्हें असहज करता था। रिपोर्ट में कमर के पास चुटकी काटने और पीठ पर रगड़ने जैसे आरोपों का भी उल्लेख था।


एक घटना में शिक्षक ने एक छात्रा को नक्शा लेकर नहीं आने पर थप्पड़ मारा था और उसकी गर्दन को कथित तौर पर अनुचित तरीके से छुआ था। कुछ अन्य छात्राओं ने बताया कि शिक्षक ने उन्हें नहीं छुआ, लेकिन वह उन्हें इस तरह देखता था जिससे वे असहज महसूस करती थीं। FIR दर्ज होने के बाद शिक्षक ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए कलकत्ता हाईकोर्ट का रुख किया था। हाईकोर्ट की जलपाईगुड़ी सर्किट बेंच ने BNSS की धारा 528 के तहत कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया। इसके बाद शिक्षक ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान Counselling-cum-Enquiry Report और उपलब्ध सामग्री का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने माना कि शिक्षक द्वारा छात्राओं को शारीरिक सजा देना और उनका इस तरह स्पर्श करना उचित नहीं था। कोर्ट ने उसके आचरण को “inappropriate” और “insensitive” बताया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि POCSO एक्ट के तहत धारा 10 में aggravated sexual assault का अपराध बनाने के लिए आवश्यक तत्वों का मौजूद होना जरूरी है। अदालत के अनुसार, उपलब्ध सामग्री से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि शिक्षक की हरकतों के पीछे यौन मंशा थी। इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक के खिलाफ दर्ज POCSO मामले और उससे जुड़ी आगे की आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।


अदालत ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि इस मामले में मुकदमा चलाकर अंत में शिक्षक को बरी कर देना भी पर्याप्त राहत नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि केवल अंतिम बरी होने से अभियोजन की वजह से शिक्षक को होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती और ऐसे आरोपों से शिक्षक पर ऐसा कलंक लग सकता है, जिसे बाद में पूरी तरह मिटाना मुश्किल होगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला हालांकि शिक्षक के व्यवहार को सही नहीं ठहराता। अदालत ने स्पष्ट रूप से उसके आचरण को अनुचित और असंवेदनशील माना, लेकिन आपराधिक कानून में किसी व्यक्ति को POCSO के तहत दोषी ठहराने या मुकदमा चलाने के लिए संबंधित अपराध के सभी आवश्यक तत्वों का मौजूद होना जरूरी है। इस मामले में अदालत ने पाया कि aggravated sexual assault के लिए आवश्यक यौन मंशा प्रथमदृष्टया सामने नहीं आती।

इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक के खिलाफ POCSO की कार्यवाही समाप्त कर दी।