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लद्दाख में सरकारी जमीन पर बड़े फैसलों का विरोध, सोनम वांगचुक ने फिर उठाई आवाज
लद्दाख में सरकारी जमीन के आवंटन और स्थानीय प्रशासनिक फैसलों को लेकर विवाद बढ़ता दिख रहा है। सोनम वांगचुक ने आरोप लगाया कि 9 सितंबर की केंद्र के साथ बैठक में यह स्पष्ट आश्वासन नहीं मिला कि लोकतांत्रिक सरकार बनने तक जमीन आवंटन और स्थानीय शासन से जुड़े बड़े फैसले नहीं लिए जाएंगे।

नई दिल्ली: लद्दाख में सरकारी जमीन के आवंटन और भूमि से जुड़े फैसलों को लेकर केंद्र सरकार और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों के बीच मतभेद एक बार फिर सामने आए हैं। 9 सितंबर को गृह मंत्रालय की उपसमिति के साथ हुई बैठक के बाद लेह एपेक्स बॉडी के सदस्य सोनम वांगचुक ने आरोप लगाया कि केंद्र की ओर से यह स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया गया कि निर्वाचित व्यवस्था बनने तक जमीन आवंटन और स्थानीय शासन से जुड़े बड़े फैसले नहीं किए जाएंगे। वांगचुक ने 12 सितंबर को दिल्ली में कहा कि लद्दाख के लोगों की मांग केवल प्रशासनिक बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन, प्राकृतिक संसाधनों और स्थानीय शासन से जुड़े फैसलों में स्थानीय प्रतिनिधित्व भी जरूरी है। उनके मुताबिक, ऐसे फैसले जो भविष्य में वापस लेना मुश्किल हों, उन्हें स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक व्यवस्था बनने तक टाला जाना चाहिए।
जमीन के अधिकार पर क्यों है विवाद?
लद्दाख के क्षेत्रीय संगठन लंबे समय से भूमि, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े मामलों में स्थानीय लोगों को अधिक अधिकार देने की मांग कर रहे हैं। इसी संदर्भ में संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा और एक मजबूत निर्वाचित व्यवस्था की मांग भी उठती रही है। हाल की केंद्र के साथ बातचीत में जमीन और प्राकृतिक संसाधनों पर विधायी अधिकार देने की संभावना पर चर्चा हुई। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस के प्रतिनिधियों के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था को जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल और पर्यावरण जैसे विषयों पर अधिकार देने की बात सामने आई है।
9 सितंबर की बैठक में क्या हुआ?
गृह मंत्रालय की उपसमिति और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच 9 सितंबर को नई दिल्ली में बातचीत हुई। इस बातचीत का एक प्रमुख मुद्दा लद्दाख के लिए प्रस्तावित निर्वाचित केंद्रशासित प्रदेश स्तरीय निकाय था। रिपोर्टों के मुताबिक, केंद्र की ओर से ऐसे निकाय की संभावना पर चर्चा की गई, जिसे जमीन, संस्कृति, भाषा, जंगल, पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों जैसे विषयों पर विधायी अधिकार दिए जा सकते हैं। हालांकि, बैठक के बाद लद्दाख के प्रतिनिधियों ने कहा कि उन्हें प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर ठोस मसौदा या स्पष्ट समयसीमा नहीं मिली। यही वजह है कि भूमि आवंटन का मुद्दा अब व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक अधिकारों की मांग से जुड़ गया है।
Nautor जमीन का मुद्दा भी अहम
लद्दाख में सरकारी जमीन से जुड़ा एक अलग महत्वपूर्ण मामला Nautor Land का है। Nautor जमीन से आशय ऐसी सरकारी बंजर या बेकार भूमि से है, जिसे ऐतिहासिक रूप से खेती या अन्य उपयोग के लिए लोगों को आवंटित किया जाता रहा है। सितंबर 2026 में लद्दाख प्रशासन ने Ladakh Autonomous Hill Development Councils (Nautor Regularisation) Rules, 2026 को मंजूरी दी। इन नियमों के तहत पात्र Nautor भूमि धारकों को अधिकतम 10 एकड़ तक मालिकाना अधिकार देने का प्रावधान किया गया है। 10 एकड़ से अधिक भूमि के लिए लीजहोल्ड व्यवस्था का प्रावधान है। नियमों के तहत यह प्रक्रिया उन पात्र Nautor भूमि कब्जों पर लागू होगी जो निर्धारित कटऑफ से पहले मौजूद थे। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार लद्दाख के राजस्व रिकॉर्ड में 60,000 एकड़ से अधिक Nautor भूमि दर्ज है।
स्थानीय प्रतिनिधित्व की मांग क्यों?
लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग केंद्रशासित प्रदेश बनाया गया था। इसके बाद क्षेत्र के विभिन्न संगठनों ने भूमि, रोजगार, पर्यावरण और सांस्कृतिक पहचान की सुरक्षा के लिए संवैधानिक संरक्षण की मांग तेज की। क्षेत्रीय संगठनों का तर्क है कि लद्दाख की भौगोलिक परिस्थितियों और सीमित संसाधनों को देखते हुए भूमि और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भूमिका मजबूत होनी चाहिए। इसी वजह से निर्वाचित निकाय और विधायी अधिकारों की मांग को भूमि विवाद से जोड़कर देखा जा रहा है।
सोनम वांगचुक ने क्या कहा?
बैठक के बाद सोनम वांगचुक ने केंद्र की बातचीत से निराशा जताई। उन्होंने कहा कि सरकार के साथ बातचीत सौहार्दपूर्ण रही, लेकिन जमीन आवंटन और स्थानीय शासन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपेक्षित स्पष्टता नहीं मिली। वांगचुक ने यह भी संकेत दिया है कि यदि प्रमुख मांगों पर स्पष्ट आश्वासन नहीं मिलता है तो 19 सितंबर से आंदोलन का नया चरण शुरू किया जा सकता है।
आगे क्या?
फिलहाल लद्दाख में जमीन का मुद्दा तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण हो गया है—सरकारी जमीन का आवंटन, Nautor भूमि के अधिकार और भविष्य की निर्वाचित व्यवस्था को भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार। केंद्र और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच आगे होने वाली बातचीत में यह स्पष्ट होना महत्वपूर्ण होगा कि प्रस्तावित निर्वाचित निकाय को जमीन से जुड़े कितने अधिकार दिए जाते हैं और मौजूदा प्रशासन द्वारा किए जाने वाले भूमि संबंधी फैसलों के लिए क्या व्यवस्था तय होती है। लद्दाख में भूमि अधिकार को लेकर जारी बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका सीधा संबंध क्षेत्र के स्थानीय शासन, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्णय लेने की शक्ति से जुड़ा हुआ है।
