डोंबिवली पूर्व में वर्ष 2008 में तीन इलेक्ट्रिक खंभे चोरी करने के मामले में कल्याण कोर्ट ने 18 साल बाद तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ चोरी का आरोप संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। मामले में शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी तक कोर्ट में गवाही के लिए पेश नहीं हो सके। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, कोर्ट नंबर 3, कल्याण के न्यायाधीश निलेश प्रभाकर वासाडे ने 11 सितंबर 2026 को नियमित फौजदारी खटला क्र. 325/2008 में यह फैसला सुनाया। मामला मानपाड़ा पुलिस स्टेशन के अपराध क्रमांक I-169/2008 से संबंधित था।
अभियोजन के अनुसार, 5 मार्च 2008 को शाम करीब 5:30 से 6:15 बजे के बीच डोंबिवली पूर्व के संदप रोड स्थित GSA India और जिंदल फैक्ट्री के पास तीन इलेक्ट्रिक खंभे चोरी किए गए थे। आरोप था कि आरोपियों ने अन्य लोगों के साथ मिलकर इन खंभों को शिकायतकर्ता की अनुमति के बिना चोरी कर लिया। मामले में आरोपी मोहम्मद कासिम हुसैन अंसारी, शामदेव उर्फ मिस्त्री दिनानाथ यादव और जयपाल उर्फ राणा शांतीलालसिंग राजपूत के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 379 और 34 के तहत मामला चलाया गया। एक अन्य आरोपी संतोष चंद्रदेव चौधरी की मृत्यु हो चुकी थी, जबकि कुछ आरोपियों को फरार घोषित किया गया था। पुलिस ने मामले की जांच के दौरान घटनास्थल का पंचनामा तैयार करने, आरोपियों को गिरफ्तार करने और दो पंचों की मौजूदगी में कथित तौर पर तीन इलेक्ट्रिक खंभों को बरामद करने का दावा किया था। इसके बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। हालांकि, जब मामला ट्रायल तक पहुंचा तो अभियोजन पक्ष अपने प्रमुख गवाहों को कोर्ट में पेश नहीं कर सका। शिकायतकर्ता, स्वतंत्र गवाह, पंच और जांच अधिकारी को बार-बार समन्स जारी किए गए, लेकिन वे अदालत में उपस्थित नहीं हुए। अंततः कोर्ट ने समन्स की तामील करने वाले पुलिस कर्मचारी को गवाह के रूप में पेश किया। उसने बताया कि वह वर्ष 2021 से मानपाड़ा पुलिस स्टेशन में समन्स बजाने का काम कर रहा है। उसके अनुसार, शिकायतकर्ता की उम्र करीब 80 वर्ष होने के कारण वह अदालत में आने में असमर्थ था, जबकि जांच अधिकारी को लकवा होने की वजह से वह भी पेश नहीं हो सके। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष द्वारा आरोप साबित करने के लिए आवश्यक प्रत्यक्ष और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य अदालत के सामने नहीं आए। ऐसे में आरोपियों के खिलाफ चोरी का अपराध संदेह से परे साबित नहीं हुआ।
न्यायाधीश निलेश प्रभाकर वासाडे ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं। इसलिए तीनों आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 379 के तहत अपराध से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 248(1) के तहत निर्दोष मुक्त कर दिया गया। कोर्ट ने आरोपियों और उनके जमानतदारों के बंधपत्र भी रद्द करने का आदेश दिया। वहीं, मामले में जब्त किए गए करीब 30 फीट लंबे तीन इलेक्ट्रिक खंभों के टुकड़ों को अपील की अवधि समाप्त होने के बाद सार्वजनिक नीलामी के जरिए बेचकर प्राप्त राशि सरकारी खाते में जमा करने का निर्देश दिया गया। इस मामले में अपराध 5 मार्च 2008 को हुआ था और पुलिस ने 23 जून 2008 को आरोपपत्र दाखिल किया था। आरोप 5 मई 2009 को तय हुए और साक्ष्य की प्रक्रिया 15 मई 2009 से शुरू हुई। करीब 18 साल 2 महीने 19 दिन बाद 11 सितंबर 2026 को मामले का अंतिम फैसला आया।