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₹10 लाख के चेक बाउंस मामले में बिल्डर बरी, जमीन पर शिकायतकर्ता का मालिकाना हक नहीं था; कल्याण कोर्ट का बड़ा फैसला

डोंबिवली में जमीन के पुनर्विकास सौदे से जुड़े ₹10 लाख के चेक बाउंस मामले में कल्याण कोर्ट ने 75 वर्षीय बिल्डर को बरी कर दिया। कोर्ट ने माना कि शिकायतकर्ता खुद विवादित जमीन का मालिक नहीं था, इसलिए चेक को कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया साबित नहीं हुआ। 11 सितंबर 2026 को अदालत ने आरोपी को धारा 138 के आरोप से निर्दोष मुक्त कर दिया।

Sonali12 सित. 2026, 06:01 PM IST
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₹10 लाख के चेक बाउंस मामले में बिल्डर बरी, जमीन पर शिकायतकर्ता का मालिकाना हक नहीं था; कल्याण कोर्ट का बड़ा फैसला

 डोंबिवली में जमीन के पुनर्विकास सौदे से जुड़े ₹10 लाख के चेक बाउंस मामले में कल्याण कोर्ट ने 75 वर्षीय बिल्डर को बड़ी राहत देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता विवादित जमीन का वास्तविक मालिक नहीं था और वह यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी द्वारा जारी किया गया चेक किसी कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी के भुगतान के लिए था। कल्याण की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्वेता एस. घारे की तीसरी अदालत ने 11 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। मामला Negotiable Instruments Act की धारा 138 के तहत दायर किया गया था और करीब 7 साल 11 महीने बाद इसका निपटारा हुआ।


मामला डोंबिवली पूर्व के एक जमीन पुनर्विकास सौदे से संबंधित था। शिकायतकर्ता मल्लेश भीमय्या बदरमेना ने अपनी कथित कब्जे वाली जमीन, सर्वे नंबर 20, हिस्सा नंबर 1, मौजे सागरली, तालुका कल्याण को आरोपी वसंत बाबूराव पाटील को विकास के लिए देने का दावा किया था। शिकायतकर्ता के अनुसार, शुरुआत में आरोपी ने उसे 3000 वर्गफुट निर्मित क्षेत्र देने पर सहमति जताई थी। बाद में दोनों के बीच ₹75 लाख में समझौता हुआ। इसमें से ₹25 लाख का भुगतान किया गया और बाकी ₹50 लाख तीन महीने में देने की बात कही गई। इसी भुगतान के लिए आरोपी ने चार चेक जारी किए थे। इनमें से ₹10 लाख का चेक नंबर 136208, जिसकी तारीख 2 अगस्त 2018 थी, बैंक में जमा करने पर 3 अगस्त 2018 को “Payment Stopped by Drawer” की वजह से बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने 9 अगस्त 2018 को कानूनी नोटिस भेजा और चेक की रकम की मांग की। भुगतान नहीं होने पर उसने कोर्ट में धारा 138 के तहत शिकायत दर्ज कराई। हालांकि, सुनवाई के दौरान आरोपी ने इस लेन-देन की कानूनी वैधता पर सवाल उठाया। आरोपी का कहना था कि बाद में उसे पता चला कि जिस जमीन को लेकर समझौता किया गया था, शिकायतकर्ता उसका मालिक ही नहीं था। इसके बाद आरोपी ने बैंक को सभी चेक का भुगतान रोकने का निर्देश दिया और समझौता रद्द कराने के लिए सिविल कोर्ट में मुकदमा भी दायर किया। कोर्ट ने शिकायतकर्ता की जिरह में सामने आए तथ्यों को महत्वपूर्ण माना। शिकायतकर्ता ने स्वीकार किया कि वह सर्वे नंबर 20, हिस्सा नंबर 1 का मालिक नहीं था। उसने यह भी बताया कि उसने वर्ष 2008 में किसी अन्य व्यक्ति से एग्रीमेंट टू सेल के जरिए जमीन लेने का दावा किया था, लेकिन उस कथित समझौते को अदालत के रिकॉर्ड पर पेश नहीं किया गया।


कोर्ट ने माना कि Negotiable Instruments Act की धारा 118 और 139 के तहत चेक को लेकर कानूनी देनदारी की प्रारंभिक धारणा शिकायतकर्ता के पक्ष में थी, लेकिन यह धारणा आरोपी द्वारा संभावित बचाव के जरिए खंडित की जा सकती है। अदालत के मुताबिक, आरोपी यह दिखाने में सफल रहा कि चेक जिस मूल लेन-देन से जुड़ा था, उसमें शिकायतकर्ता के पास जमीन पर वैध मालिकाना अधिकार नहीं था। ऐसे में उस लेन-देन से आरोपी के खिलाफ कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी का अस्तित्व संदिग्ध हो गया।

कोर्ट ने यह भी ध्यान दिया कि आरोपी ने जमीन के मालिकाना हक की स्थिति सामने आने के बाद 31 मई 2018 को बैंक को भुगतान रोकने का निर्देश दिया था। अदालत ने इस कार्रवाई को परिस्थितियों के आधार पर सद्भावना में किया गया कदम माना। इसके अलावा, शिकायतकर्ता ने यह भी स्वीकार किया कि उसने ₹50 लाख की कथित बकाया रकम की वसूली के लिए कोई सिविल मुकदमा दायर नहीं किया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इसी लेन-देन से जुड़े अन्य चेकों को लेकर भी अलग-अलग शिकायतें की गई थीं।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि शिकायतकर्ता ₹10 लाख के विवादित चेक को कानूनी रूप से वसूल योग्य कर्ज या देनदारी के निर्वहन के लिए जारी किया गया चेक साबित नहीं कर सका।


अदालत ने आरोपी वसंत बाबूराव पाटील को Negotiable Instruments Act की धारा 138 के अपराध से CrPC की धारा 255(1) के तहत बरी कर दिया। साथ ही ट्रायल के दौरान आरोपी के जमानत बांड रद्द कर दिए गए और CrPC की धारा 437-A के तहत ₹15,000 की जमानत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चेक का बाउंस होना और कानूनी नोटिस जारी होना अपने आप में धारा 138 के तहत दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। शिकायतकर्ता को यह भी साबित करना होता है कि चेक किसी कानूनी रूप से वसूल योग्य कर्ज या देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था।