law-order
भीख मांगने को अपराध बनाने वाले कानून की संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती, PIL में गरीबी और बेघर लोगों के अधिकारों का मुद्दा
भीख मांगने को अपराध मानने वाले करीब छह दशक पुराने कानून की संवैधानिक वैधता अब बॉम्बे हाईकोर्ट के कटघरे में है। Bombay Prevention of Begging Act, 1960 को चुनौती देते हुए दाखिल PIL में दावा किया गया है कि यह कानून गरीबी, बेघरपन और बदहाली में जीवन जी रहे लोगों को अपराधी बनाता है। याचिका में कानून को मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखने की मांग की गई है।

मुंबई में भीख मांगने से जुड़े करीब छह दशक पुराने कानून की संवैधानिक वैधता को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। एक NGO की ओर से दायर जनहित याचिका (PIL) में आरोप लगाया गया है कि Bombay Prevention of Begging Act, 1960 गरीबी, बेघरपन और अत्यधिक अभाव की परिस्थितियों में जीवन जीने वाले लोगों को ही अपराधी बना देता है। याचिका Centre for Promoting Democracy नामक NGO की ओर से अधिवक्ता Khalil-ur-Rehaman के माध्यम से दाखिल की गई है। याचिका में कानून के उन प्रावधानों को चुनौती दी गई है, जिनके तहत सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगने या उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए कार्रवाई की जा सकती है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि गरीबी और बेघरपन अपने आप में अपराध नहीं हैं। ऐसे लोगों को दंडित करने के बजाय राज्य का दायित्व होना चाहिए कि वह उन्हें सामाजिक सुरक्षा, आश्रय और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए।
PIL में कहा गया है कि कानून का मौजूदा ढांचा समाज के सबसे कमजोर वर्गों को निशाना बना सकता है और उनके मौलिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। याचिका में संवैधानिक प्रावधानों के तहत समानता, गरिमा और जीवन के अधिकार से जुड़े पहलुओं को भी उठाया गया है। याचिका में बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बेगिंग एक्ट, 1960 की संवैधानिक वैधता की न्यायिक जांच की मांग की गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि किसी व्यक्ति की गरीबी या उसके पास आजीविका का साधन न होना उसे अपराधी मानने का आधार नहीं होना चाहिए। बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर इस PIL के माध्यम से अदालत से यह जांच करने का अनुरोध किया गया है कि क्या भीख मांगने को दंडनीय बनाने वाले प्रावधान संविधान में मिले मौलिक अधिकारों की कसौटी पर खरे उतरते हैं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में भिक्षावृत्ति, बेघरपन, गरीबी और सामाजिक पुनर्वास को लेकर कानून एवं मानवाधिकार के बीच संतुलन का सवाल लगातार चर्चा में रहा है। अब बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष यह मुद्दा उठने से 1960 के इस कानून की संवैधानिक वैधता पर महत्वपूर्ण न्यायिक बहस की संभावना है। याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई होना बाकी है। अदालत की ओर से कानून की वैधता या याचिका में उठाए गए मुद्दों पर अंतिम निर्णय अभी नहीं आया है।
