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चार्ज फ्रेम नहीं हुआ, फिर भी हो सकती है सजा! सुप्रीम कोर्ट ने बताया कब; CrPC की धारा 464 पर दिया बड़ा स्पष्टीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हर मामले में बिना चार्ज फ्रेम किए गए अपराध में दोषसिद्धि अपने आप अवैध नहीं हो जाती। कोर्ट ने कहा कि अपीलीय या पुनरीक्षण अदालत कुछ परिस्थितियों में आरोपी को ऐसे अपराध के लिए भी दोषी ठहरा सकती है, यदि वह मूल आरोप से संबंधित या कम गंभीर अपराध हो और आरोपी के साथ न्याय में कोई वास्तविक विफलता न हुई हो।

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में आरोप तय करने और दोषसिद्धि से जुड़े एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर अहम स्पष्टीकरण दिया है। कोर्ट ने कहा है कि कुछ परिस्थितियों में किसी आरोपी को उस अपराध के लिए भी दोषी ठहराया जा सकता है, जिसके लिए उसके खिलाफ औपचारिक रूप से चार्ज फ्रेम नहीं किया गया था। हालांकि, ऐसा तभी संभव है जब संबंधित अपराध मूल आरोप से संबंधित यानी cognate या minor offence हो और आरोपी के साथ न्याय में कोई वास्तविक विफलता न हुई हो। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर दोषसिद्धि को रद्द नहीं किया जा सकता कि संबंधित अपराध के लिए अलग से आरोप तय नहीं किया गया था। CrPC की धारा 464 ऐसी स्थिति में अदालत को यह जांचने की अनुमति देती है कि चार्ज में हुई कमी या गलती के कारण आरोपी के साथ वास्तव में कोई prejudice या failure of justice हुआ है या नहीं।
अपीलीय और पुनरीक्षण अदालत को भी है अधिकार
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, अपीलीय अदालत या पुनरीक्षण अदालत ऐसे मामले में आरोपी को उस अपराध के लिए दोषी ठहरा सकती है, जिसके लिए ट्रायल कोर्ट ने चार्ज फ्रेम नहीं किया था। लेकिन यह शक्ति असीमित नहीं है। अदालत को यह देखना होगा कि जिस अपराध के लिए दोषसिद्धि की जा रही है, वह मूल रूप से लगाए गए आरोप से संबंधित या कम गंभीर प्रकृति का है और आरोपी को अपनी रक्षा करने का पर्याप्त अवसर मिला था। कोर्ट ने धारा 464 CrPC के संदर्भ में कहा कि चार्ज में कोई त्रुटि, omission या irregularity अपने आप में पूरी कार्यवाही को अवैध नहीं बनाती। मुख्य सवाल यह है कि क्या उस त्रुटि के कारण आरोपी के साथ वास्तव में न्याय का नुकसान हुआ है।
'Failure of justice' सबसे महत्वपूर्ण कसौटी
सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि अगर आरोपी को पूरे मुकदमे के दौरान मामले की प्रकृति और उसके खिलाफ मौजूद आरोपों की पर्याप्त जानकारी थी तथा वह प्रभावी तरीके से अपना बचाव कर सका, तो केवल चार्ज के तकनीकी दोष के आधार पर दोषसिद्धि को खत्म करना जरूरी नहीं है। हालांकि, अगर चार्ज न होने के कारण आरोपी को यह पता ही नहीं था कि उसे किसी विशेष अपराध का सामना करना है और इससे उसके बचाव का अधिकार प्रभावित हुआ है, तो स्थिति अलग होगी। ऐसे मामले में अदालत को यह देखना होगा कि क्या वास्तव में failure of justice हुआ है।
Cognate या minor offence का क्या मतलब?
Cognate offence का मतलब ऐसे अपराध से है जो मूल आरोप से प्रकृति और तथ्यों के स्तर पर जुड़ा हुआ हो। वहीं minor offence अपेक्षाकृत कम गंभीर अपराध होता है, जिसके तत्व मूल रूप से लगाए गए गंभीर अपराध से जुड़े हो सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी यह सिद्धांत स्पष्ट किया है कि आपराधिक मुकदमे में चार्ज का उद्देश्य आरोपी को उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों की स्पष्ट जानकारी देना है, ताकि वह प्रभावी रूप से अपना बचाव कर सके। इसलिए हर तकनीकी कमी को मुकदमे की पूरी कार्यवाही को निष्फल करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कानून का मूल उद्देश्य आरोपी के निष्पक्ष ट्रायल के अधिकार की रक्षा करना है। साथ ही, केवल तकनीकी आधार पर ऐसे दोषी व्यक्ति को लाभ नहीं दिया जा सकता, जब यह साबित हो कि चार्ज में हुई कमी से उसके बचाव पर कोई वास्तविक प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि किसी आरोपी को बिना फ्रेम किए गए आरोप में दोषी ठहराने का सवाल केवल तकनीकी नहीं है। अदालत को अपराध की प्रकृति, मूल आरोप से उसके संबंध और आरोपी के बचाव पर पड़े वास्तविक प्रभाव को देखना होगा। अगर अपराध cognate या minor है और failure of justice नहीं हुआ है, तो अपीलीय या पुनरीक्षण अदालत दोषसिद्धि कर सकती है।
