law-order

'न्याय करने के लिए जज में रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए', 76 साल के PMLA आरोपी को बीमारी के आधार पर अंतरिम जमानत; पंजाब-हरियाणा HC की अहम टिप्पणी

“न्याय करने के लिए जज में रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए”—पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 76 वर्षीय PMLA आरोपी को खराब स्वास्थ्य और लंबी हिरासत के आधार पर अंतरिम जमानत देते हुए यह अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि 75 वर्ष से अधिक उम्र के बीमार व्यक्ति की जमानत याचिका पर फैसला करते समय अदालत को बेहद संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।

Sonali14 सित. 2026, 05:09 PM IST
खबर शेयर करें:
'न्याय करने के लिए जज में रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए', 76 साल के PMLA आरोपी को बीमारी के आधार पर अंतरिम जमानत; पंजाब-हरियाणा HC की अहम टिप्पणी

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग मामले में आरोपी 76 वर्षीय व्यक्ति को खराब स्वास्थ्य और लंबे समय से हिरासत में रहने के आधार पर अंतरिम जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा कि 75 वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे व्यक्ति की जमानत याचिका पर विचार करते समय, जो गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहा हो, न्यायाधीश को बेहद संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण के साथ मामले पर विचार करना चाहिए। जस्टिस अनूप चितकारा और जस्टिस हरमीत सिंह देओल की पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि ऐसे मामलों में जमानत पर फैसला करते समय अदालत को केवल तकनीकी पहलुओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कोर्ट ने टिप्पणी की कि न्याय करने के लिए जज में 'रीढ़ की हड्डी' यानी साहस और संवेदनशीलता होनी चाहिए।


76 वर्षीय आरोपी की मेडिकल स्थिति पर जोर

मामला Prevention of Money Laundering Act (PMLA) के तहत दर्ज मनी लॉन्ड्रिंग केस से संबंधित था। आरोपी की उम्र 76 वर्ष है और उसकी ओर से खराब स्वास्थ्य को अंतरिम जमानत का प्रमुख आधार बनाया गया था। हाईकोर्ट ने आरोपी की उम्र, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं और हिरासत की अवधि को ध्यान में रखते हुए मेडिकल आधार पर अंतरिम राहत देना उचित माना। कोर्ट ने कहा कि 75 वर्ष से अधिक उम्र के व्यक्ति की बीमारी से जुड़ी जमानत याचिका को असंवेदनशील तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए।

कोर्ट ने जमानत के मामलों में मानवीय दृष्टिकोण पर जोर दिया हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वास्थ्य से जुड़े मामलों में अदालतों को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। खास तौर पर जब आरोपी वृद्ध हो और उसकी चिकित्सा स्थिति चिंता का विषय हो, तब अदालत को मामले के तथ्यों को संवेदनशीलता से देखना चाहिए। पीठ ने यह भी संकेत दिया कि केवल इसलिए कि मामला PMLA जैसे गंभीर कानून के तहत दर्ज है, अदालत आरोपी की उम्र और स्वास्थ्य की वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकती। हालांकि, मेडिकल बेल देते समय अदालत को मामले की गंभीरता और लागू कानूनी शर्तों को भी ध्यान में रखना होता है।


'न्याय करने के लिए रीढ़ की हड्डी होनी चाहिए'

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की टिप्पणी का सबसे अहम हिस्सा जज के दृष्टिकोण को लेकर था। कोर्ट ने कहा कि 75 वर्ष से अधिक उम्र के ऐसे व्यक्ति की जमानत याचिका, जो स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहा है, खारिज करने से पहले न्यायाधीश को 'न्याय करने के लिए रीढ़ की हड्डी' दिखानी चाहिए और मामले को पूरी संवेदनशीलता के साथ देखना चाहिए। कोर्ट का जोर इस बात पर था कि न्यायिक विवेक का इस्तेमाल करते समय मानवीय पहलू को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विशेष रूप से वृद्ध और बीमार आरोपियों के मामलों में हिरासत की आवश्यकता और उनके स्वास्थ्य के बीच उचित संतुलन बनाना जरूरी है।


PMLA मामले में अंतरिम राहत

हाईकोर्ट ने अंततः आरोपी को मेडिकल आधार पर अंतरिम जमानत प्रदान की। यह राहत अंतरिम प्रकृति की है और इसका अर्थ यह नहीं है कि आरोपी को मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों से बरी कर दिया गया है या उसके खिलाफ चल रही कार्यवाही समाप्त हो गई है। फैसले का व्यापक संदेश यह है कि गंभीर आर्थिक अपराधों से जुड़े मामलों में भी अदालतें आरोपी की उम्र, स्वास्थ्य और हिरासत की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं कर सकतीं। न्यायिक प्रक्रिया में कानून की कठोरता के साथ मानवीय संवेदनशीलता को भी महत्व दिया जाना चाहिए।