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BRICS घोषणापत्र में इजरायल पर सख्त रुख, क्या बदल रही है भारत की पश्चिम एशिया नीति?

नई दिल्ली: भारत की मेजबानी में हुए BRICS शिखर सम्मेलन के बाद जारी नई दिल्ली घोषणापत्र में गाजा की स्थिति, फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष को लेकर कड़ा रुख अपनाया गया। घोषणापत्र में फिलिस्तीनी लोगों के अधिकारों और संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के समर्थन के साथ दो-राष्ट्र समाधान पर जोर दिया गया है। हालांकि, इस रुख को भारत की इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी में तत्काल बदलाव के संकेत के तौर पर देखना जल्दबाजी होगी।

sd14 सित. 2026, 05:09 PM IST
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BRICS घोषणापत्र में इजरायल पर सख्त रुख, क्या बदल रही है भारत की पश्चिम एशिया नीति?

     

       नई दिल्ली: भारत की अध्यक्षता में 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के बाद जारी New Delhi Declaration में पश्चिम एशिया और खास तौर पर गाजा की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही गई हैं। BRICS देशों ने फिलिस्तीनी नागरिकों के जबरन विस्थापन का विरोध किया और फिलिस्तीनी लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार तथा एक स्वतंत्र और संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के समर्थन को दोहराया। घोषणापत्र में गाजा की मानवीय स्थिति पर गंभीर चिंता जताते हुए अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों के पालन पर जोर दिया गया। BRICS ने पश्चिम एशिया में संघर्षों के समाधान के लिए बातचीत, कूटनीति और बहुपक्षीय प्रयासों को आगे बढ़ाने की बात कही है।

दो-राष्ट्र समाधान पर जोर

घोषणापत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा फिलिस्तीन के भविष्य से जुड़ा है। BRICS देशों ने ऐसे समाधान का समर्थन किया है जिसमें फिलिस्तीनी लोगों के लिए एक संप्रभु राष्ट्र की स्थापना हो और इजरायल तथा फिलिस्तीन के बीच स्थायी शांति का रास्ता निकले। इस रुख को लंबे समय से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन के रूप में देखा जा रहा है। घोषणापत्र में गाजा से फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन के प्रयासों का विरोध भी किया गया है। इसके अलावा पश्चिम एशिया में जारी तनाव को कम करने और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत विवादों का समाधान करने पर जोर दिया गया है।

क्या भारत ने इजरायल पर अपना रुख बदला?

BRICS घोषणापत्र की भाषा को देखते हुए यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत की इजरायल नीति में कोई बड़ा बदलाव आया है। हालांकि, उपलब्ध आधिकारिक दस्तावेज और सम्मेलन की व्यापक तस्वीर से भारत की विदेश नीति में तत्काल बदलाव का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा।

भारत एक तरफ इजरायल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखता है, वहीं दूसरी तरफ फिलिस्तीनी राज्य और दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन भी करता रहा है। इसलिए BRICS के सामूहिक घोषणापत्र को भारत के द्विपक्षीय संबंधों से अलग बहुपक्षीय कूटनीति के संदर्भ में देखना ज्यादा उचित होगा।

BRICS में सहमति बनाना भी बड़ी चुनौती

इस बार BRICS में पश्चिम एशिया को लेकर सहमति बनाना आसान नहीं था। संगठन में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अलग-अलग क्षेत्रीय हित रखने वाले देश शामिल हैं। इसके बावजूद सदस्य देशों ने संयुक्त घोषणापत्र जारी किया, जिसमें पश्चिम एशिया में तनाव कम करने और बातचीत के जरिए समाधान पर जोर दिया गया। रॉयटर्स के मुताबिक, घोषणापत्र में मध्य पूर्व की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए अधिकतम संयम बरतने और संवाद तथा कूटनीति के जरिए विवादों को हल करने की अपील की गई।

भारत के लिए संतुलन क्यों महत्वपूर्ण?

भारत के लिए इजरायल और फिलिस्तीन दोनों के साथ संबंध महत्वपूर्ण हैं। इजरायल के साथ भारत के रक्षा, कृषि, तकनीक और सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग हैं, जबकि पश्चिम एशिया के अरब देशों के साथ भारत के ऊर्जा, व्यापार, निवेश और प्रवासी भारतीयों से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं। ऐसे में नई दिल्ली के सामने चुनौती यह है कि वह इजरायल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को बनाए रखते हुए फिलिस्तीन के मुद्दे पर अपनी पारंपरिक नीति और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ संबंधों को भी संतुलित रखे।

क्या इससे भारत-इजरायल संबंध प्रभावित होंगे?

फिलहाल ऐसा कोई आधिकारिक संकेत नहीं है कि BRICS घोषणापत्र के कारण भारत-इजरायल के द्विपक्षीय संबंधों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। घोषणापत्र BRICS के सभी सदस्य देशों की सामूहिक सहमति का दस्तावेज है, इसलिए इसमें शामिल भाषा को सीधे भारत की द्विपक्षीय विदेश नीति का बयान मानना सही नहीं होगा। भारत ने BRICS अध्यक्ष के रूप में विभिन्न देशों के बीच सहमति बनाने पर भी जोर दिया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, नई दिल्ली ने BRICS को किसी एक भू-राजनीतिक गुट में बदलने के बजाय व्यावहारिक सहयोग और वैश्विक शासन सुधार पर केंद्रित रखने की कोशिश की।

इस लिहाज से BRICS घोषणापत्र में इजरायल और गाजा को लेकर कड़ी भाषा भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और बहुपक्षीय कूटनीति का हिस्सा अधिक दिखाई देती है, न कि इजरायल के साथ संबंधों से पीछे हटने का सीधा संकेत।


निष्कर्ष: नई दिल्ली घोषणापत्र में फिलिस्तीनी अधिकारों, गाजा में जबरन विस्थापन के विरोध और दो-राष्ट्र समाधान को लेकर BRICS का रुख स्पष्ट है। लेकिन भारत के मामले में इसे इजरायल से दूरी बनाने की नीति कहना फिलहाल सही नहीं होगा। भारत के लिए चुनौती दोनों मोर्चों पर संतुलन बनाए रखने की है—इजरायल के साथ रणनीतिक साझेदारी और फिलिस्तीन के लिए स्वतंत्र राष्ट्र तथा स्थायी शांति का समर्थन।