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वॉलीबॉल वापस नहीं की और पिता को बुलाने को कहा, बच्चे ने उठाया खौफनाक कदम; क्या यह आत्महत्या के लिए उकसाना है? कर्नाटक HC का फैसला
कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की वॉलीबॉल वापस न करना और गेंद लेने के लिए उसके पिता को बुलाने को कहना, अकेले आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने दो आरोपियों को बरी करने के फैसले के खिलाफ दायर अपील खारिज कर दी।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि बच्चे की वॉलीबॉल वापस करने से इनकार करना और उसे गेंद लेने के लिए अपने पिता को बुलाने के लिए कहना, अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनता। कोर्ट ने इस मामले में दो आरोपियों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी। यह मामला Gnanashekar M v. State of Karnataka से संबंधित था। न्यायमूर्ति एच.पी. संदेश और न्यायमूर्ति बी. प्रमोद की पीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामला एक बच्चे की मौत से जुड़ा था, जिसके बाद दो लोगों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाया गया था। अभियोजन पक्ष की कहानी के अनुसार, बच्चे की वॉलीबॉल आरोपियों के पास चली गई थी। आरोप था कि गेंद वापस मांगने पर आरोपियों ने उसे तुरंत गेंद देने से इनकार कर दिया और कहा कि वह अपने पिता को लेकर आए, जिसके बाद उसे गेंद वापस दी जाएगी।
बाद में बच्चे की मौत हो गई और इस घटना के संबंध में आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया गया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने दोनों आरोपियों को बरी कर दिया था। इसी बरी किए जाने के आदेश को चुनौती देते हुए अपील दायर की गई थी। हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध स्थापित करने के लिए केवल ऐसी घटना पर्याप्त नहीं है, बल्कि अभियोजन को यह साबित करना आवश्यक है कि आरोपी की ओर से आत्महत्या के लिए उकसाने, सहायता करने या जानबूझकर ऐसा कृत्य करने का आवश्यक तत्व मौजूद था। कोर्ट ने माना कि बच्चे की वॉलीबॉल वापस करने से इनकार करना और उसे अपने पिता को बुलाने के लिए कहना, परिस्थितियों में भले ही बच्चे को अप्रिय लगा हो, लेकिन इसे आत्महत्या के लिए उकसाने के बराबर नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस आधार पर ट्रायल कोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें दोनों आरोपियों को बरी किया गया था। अदालत ने आरोपियों के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी आधार नहीं पाया और अपील खारिज कर दी। कोर्ट के इस फैसले से एक बार फिर स्पष्ट होता है कि आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में केवल किसी अप्रिय घटना या व्यवहार और आत्महत्या के बीच संबंध होना पर्याप्त नहीं है। अभियोजन को कानून में निर्धारित आवश्यक तत्वों और आरोपी की वास्तविक भूमिका को ठोस साक्ष्यों के आधार पर साबित करना होता है।
