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जमीन अधिग्रहण से दूध का कारोबार बंद हुआ तो मिलेगा मुआवजा, बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

जमीन अधिग्रहण के कारण यदि उससे जुड़ा दूध का कारोबार बंद हो जाता है, तो कारोबारी को हुए नुकसान की भरपाई भी मुआवजे के रूप में की जा सकती है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि भूमि अधिग्रहण कानून में ‘भूमि’ के दायरे में उससे मिलने वाले लाभ भी शामिल हैं। कोर्ट ने दूध कारोबार के रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों को देखते हुए इस नुकसान को मुआवजे के दावे से जुड़ा माना।

Sonali16 सित. 2026, 01:21 PM IST
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जमीन अधिग्रहण से दूध का कारोबार बंद हुआ तो मिलेगा मुआवजा, बॉम्बे हाईकोर्ट का बड़ा फैसला


बॉम्बे हाईकोर्ट ने जमीन अधिग्रहण से प्रभावित दूध कारोबार को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अधिग्रहित जमीन पर बने पशुशेड से चल रहे दूध के कारोबार के नुकसान को भी मुआवजे के दायरे में शामिल किया जा सकता है। अदालत ने माना कि भूमि अधिग्रहण कानून के तहत ‘भूमि’ की परिभाषा में जमीन से मिलने वाले लाभ भी शामिल हैं। ऐसे में जमीन के अधिग्रहण के कारण उससे जुड़े कारोबार को नुकसान होता है तो वह मुआवजे का आधार बन सकता है। जस्टिस अभय आहूजा ने यह फैसला उस अपील पर सुनाया, जिसमें अधिग्रहित जमीन और पशुशेड के लिए दिए गए मुआवजे को बढ़ाने की मांग की गई थी। मामला भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 के तहत अधिग्रहित जमीन से जुड़ा था। मामले में संबंधित जमीन के अधिग्रहण के लिए भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 4 और धारा 6 के तहत अधिसूचनाएं जारी की गई थीं। बाद में 19 जनवरी 2000 को जमीन का कब्जा ले लिया गया। जमीन के मालिक ने शुरू में धारा 18 के तहत रेफरेंस दायर कर मुआवजा बढ़ाने की मांग की थी। इसके बाद उसने जमीन के अधिग्रहण के कारण दूध के कारोबार को हुए नुकसान के लिए भी मुआवजे का दावा किया। अपीलकर्ता का कहना था कि वह अधिग्रहित जमीन पर बने पशुशेड से दूध का कारोबार चलाता था। जमीन का अधिग्रहण हो जाने के कारण उसका यह कारोबार प्रभावित हुआ और उसे आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। अपने दावे के समर्थन में अपीलकर्ता ने एक लेखा-पुस्तिका भी पेश की। इसमें दूध खरीदने वाले लोगों के नाम, बेचे गए दूध की मात्रा और दर के साथ-साथ पशुओं के चारे पर होने वाले खर्च का रिकॉर्ड दर्ज था। रिकॉर्ड में भैंसों की खरीद, मजदूरों को किए गए भुगतान और पशुओं की दवाइयों पर हुए खर्च का भी उल्लेख था। अदालत के समक्ष अपीलकर्ता ने मौखिक साक्ष्य भी पेश किया और बताया कि जमीन के अधिग्रहण के कारण उसका दूध कारोबार बंद हो गया। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन दस्तावेजों और मौखिक साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना।


कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Ambya Kalya Mhatre v. State of Maharashtra का भी हवाला दिया। इस फैसले के आधार पर अदालत ने कहा कि जब जमीन मालिक धारा 18 के तहत मुआवजे की राशि पर आपत्ति उठाकर रेफरेंस मांगता है, तो रेफरेंस कोर्ट के सामने मुआवजे से जुड़ा पूरा मुद्दा खुल जाता है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 18 में निर्धारित समयसीमा समाप्त होने के बाद आपत्ति की प्रकृति को बदला नहीं जा सकता। यानी यदि जमीन मालिक ने निर्धारित अवधि में केवल मुआवजे की राशि पर आपत्ति की है, तो बाद में उसी मामले को जमीन के माप या मुआवजे के बंटवारे से जुड़ी अलग श्रेणी की आपत्ति में बदलने की अनुमति नहीं होगी। हाईकोर्ट ने भूमि अधिग्रहण अधिनियम की धारा 3(a) की व्याख्या करते हुए माना कि ‘भूमि’ में उससे जुड़े लाभ भी शामिल हैं। इसलिए अधिग्रहित जमीन से सीधे तौर पर जुड़े दूध कारोबार के नुकसान को मुआवजे के दावे से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता। यह फैसला उन जमीन मालिकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है, जिनकी जमीन अधिग्रहण के कारण केवल संपत्ति के रूप में ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े व्यवसाय या आय के स्रोत के रूप में भी प्रभावित होती है।