law-order

जेल में अच्छा आचरण ही समयपूर्व रिहाई का आधार नहीं, सरकार को लेना होगा समग्र नजरिया: इलाहाबाद HC

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी की समयपूर्व रिहाई को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि प्रीमैच्योर रिलीज पर फैसला केवल अपराध की प्रकृति और जेल में कैदी के आचरण के आधार पर नहीं किया जा सकता। सरकार को कैदी के सुधार, पारिवारिक-सामाजिक परिस्थितियों और समाज में पुनर्वास की संभावनाओं समेत सभी पहलुओं पर समग्र रूप से विचार करना होगा।

Sonali16 सित. 2026, 01:21 PM IST
खबर शेयर करें:
जेल में अच्छा आचरण ही समयपूर्व रिहाई का आधार नहीं, सरकार को लेना होगा समग्र नजरिया: इलाहाबाद HC

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी की समयपूर्व रिहाई को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि किसी दोषी की प्रीमैच्योर रिलीज पर फैसला केवल अपराध की प्रकृति और जेल में उसके आचरण के आधार पर नहीं किया जा सकता। सरकार को उसके सुधार, सामाजिक-पारिवारिक परिस्थितियों, लंबे कारावास और समाज में पुनर्वास की संभावनाओं समेत व्यापक पहलुओं पर विचार करना होगा। इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ ने यह टिप्पणी उम्रकैद की सजा काट रहे आदिल उर्फ सीरन की याचिका पर सुनवाई करते हुए की। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उसकी समयपूर्व रिहाई की याचिका खारिज करने वाले आदेश को रद्द कर दिया और सरकार को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया। इसके लिए सरकार को एक महीने का समय दिया गया है।

20 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद है दोषी

आदिल उर्फ सीरन को भारतीय दंड संहिता की धारा 302/34 और 307/34 के तहत दोषी ठहराया गया था और उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने वर्ष 2018 में उसकी सजा को बरकरार रखा था। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2020 में उसकी विशेष अनुमति याचिका खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता 8 दिसंबर 2005 से लगातार जेल में बंद है। कोर्ट के समक्ष यह भी बताया गया कि इस दौरान उसे पैरोल नहीं मिली थी। अगस्त 2025 में राज्यपाल ने उसकी समयपूर्व रिहाई की मांग को स्वीकार नहीं किया था, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया।

जेल के आचरण तक सीमित नहीं हो सकता सरकार का फैसला

हाईकोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कैदियों की समयपूर्व रिहाई के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इनमें उत्तर प्रदेश कैदियों की रिहाई ऑन प्रोबेशन अधिनियम, 1938, धारा 432 CrPC के तहत नामिनल-रोल के आधार पर रिहाई, बीमारी या वृद्धावस्था के आधार पर रिहाई तथा संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत रिहाई जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। मौजूदा मामले में कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता का मामला धारा 432 CrPC और यूपी जेल मैनुअल के पैरा 180 के तहत नामिनल-रोल रिलीज से जुड़ा था। ऐसे मामले में सरकार को सुप्रीम कोर्ट के Laxman Naskar बनाम State of West Bengal मामले में तय सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए। इनमें यह देखना जरूरी है कि अपराध केवल व्यक्तिगत प्रकृति का था या समाज पर उसका व्यापक प्रभाव पड़ा, दोषी के दोबारा अपराध करने की संभावना कितनी है, क्या उसमें अपराध करने की क्षमता समाप्त हो चुकी है, क्या उसे जेल में और रखने का कोई उपयोगी उद्देश्य बचा है तथा उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्या है।

जेल में दर्ज मामलों को अकेला आधार नहीं बनाया जा सकता

हाईकोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार के फैसले में अपराध की प्रकृति और जेल में दोषी के आचरण पर काफी जोर दिया गया था। जेल में उसके खिलाफ नौ अनुशासनात्मक घटनाओं का उल्लेख भी किया गया था। हालांकि कोर्ट ने कहा कि इन सभी घटनाओं को आक्रामक या गंभीर आपराधिक व्यवहार के रूप में नहीं देखा जा सकता। कुछ मामले केवल जेल अनुशासन के उल्लंघन या प्रतिबंधित वस्तुओं के कब्जे से संबंधित थे। कोर्ट ने कहा कि जेल में दर्ज घटनाओं की रिपोर्ट अकेले उन व्यापक पहलुओं को नजरअंदाज करने का आधार नहीं बन सकती, जिन्हें समयपूर्व रिहाई पर विचार करते समय सरकार को देखना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Rajo alias Rajwa alias Rajendra Mandal बनाम State of Bihar के फैसले का भी हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि रिहाई या रिमिशन के मामले में सरकार को उपलब्ध सभी राय और परिस्थितियों का “समग्र दृष्टिकोण” अपनाना चाहिए। कोर्ट ने विशेष रूप से सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं, दोषी के लंबे कारावास, उसके परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, लगातार जेल में रखने के औचित्य और रिहाई के बाद समाज में उसके पुनर्वास की संभावना पर विचार करने की बात कही। जरूरत पड़ने पर सरकार मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन भी करा सकती है, ताकि रिहाई के बाद उसके व्यवहार की संभावनाओं का आकलन किया जा सके। अंततः हाईकोर्ट ने सरकार का पुराना आदेश रद्द करते हुए आदिल उर्फ सीरन की समयपूर्व रिहाई के प्रस्ताव पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया और एक महीने के भीतर नया आदेश पारित करने को कहा।