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सेना की ड्यूटी से दिव्यांगता नहीं हुई, यह साबित करने की जिम्मेदारी सरकार की: सुप्रीम कोर्ट ने 271 अपीलें खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों की दिव्यांगता पेंशन से जुड़े 271 मामलों में केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने कहा कि 2008 के नियमों में भर्ती के समय सैनिक के स्वस्थ होने की पूर्वधारणा हटाए जाने के बावजूद, अगर सरकार यह दावा करती है कि दिव्यांगता सैन्य सेवा से न तो हुई और न ही बढ़ी, तो इसे साबित करने की जिम्मेदारी सरकार की ही होगी। कोर्ट ने केंद्र की सभी 271 अपीलें खारिज कर दीं।

Sonali16 सित. 2026, 01:22 PM IST
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सेना की ड्यूटी से दिव्यांगता नहीं हुई, यह साबित करने की जिम्मेदारी सरकार की: सुप्रीम कोर्ट ने 271 अपीलें खारिज


सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व सैनिकों को दी गई दिव्यांगता पेंशन से जुड़े 271 मामलों में केंद्र सरकार की अपीलें खारिज करते हुए अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि 2008 के Entitlement Rules में भर्ती के समय सैनिक के स्वस्थ होने की पूर्वधारणा को हटाए जाने के बावजूद दिव्यांगता सेवा से संबंधित नहीं थी या सैन्य सेवा के कारण उसमें बढ़ोतरी नहीं हुई, यह साबित करने का दायित्व सरकार पर ही रहेगा। जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने 15 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। ये अपीलें सशस्त्र बल न्यायाधिकरण (AFT) और विभिन्न हाई कोर्ट के उन आदेशों के खिलाफ दायर की गई थीं, जिनमें पूर्व सैनिकों को दिव्यांगता पेंशन देने का निर्देश दिया गया था।


क्या है पूरा मामला?

इन मामलों में संबंधित पूर्व सैनिकों की सेवा समाप्ति के समय Release Medical Board (RMB) ने उनकी दिव्यांगता को सैन्य सेवा से न तो attributable और न ही aggravated यानी “Neither Attributable Nor Aggravated” (NANA) माना था। इसके बाद दिव्यांगता पेंशन के दावे खारिज कर दिए गए। पूर्व सैनिकों ने इन फैसलों को AFT या हाई कोर्ट में चुनौती दी। कई मामलों में AFT और हाई कोर्ट ने पूर्व सैनिकों के पक्ष में फैसला देते हुए उन्हें दिव्यांगता पेंशन का लाभ प्रदान किया। इसके बाद केंद्र सरकार ने इन आदेशों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।


2008 के नियमों को लेकर केंद्र की दलील

सुप्रीम कोर्ट के सामने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने केंद्र सरकार की ओर से दलील दी कि 1982 के Entitlement Rules और 2008 के नियमों में महत्वपूर्ण अंतर है। 1982 के नियमों के तहत भर्ती के समय सैनिक के स्वस्थ होने की पूर्वधारणा मौजूद थी, जिसके कारण सेवा के दौरान सामने आई दिव्यांगता को सैन्य सेवा से जोड़ने का आधार मिलता था। केंद्र का तर्क था कि 2008 के नियमों ने भर्ती के समय स्वस्थ होने की इस पूर्वधारणा को हटा दिया है। ऐसे में केवल सैन्य सेवा के दौरान दिव्यांगता सामने आ जाने से पेंशन का अधिकार स्वतः नहीं बन सकता। सैनिक को दिव्यांगता और सैन्य सेवा के बीच कारणात्मक संबंध दिखाना होगा। केंद्र ने 2013 के Dharamvir Singh बनाम Union of India फैसले पर भी सवाल उठाया। उसका कहना था कि यह फैसला 1982 के नियमों के संदर्भ में दिया गया था, इसलिए इसे 2008 के नियमों के तहत आने वाले मामलों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।


सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने 1982 और 2008 के Entitlement Rules का विस्तृत तुलनात्मक अध्ययन किया। कोर्ट ने माना कि 2008 के नियमों में भर्ती के समय स्वस्थ होने की पूर्वधारणा से संबंधित बदलाव किया गया है, लेकिन इससे दिव्यांगता पेंशन की पूरी लाभकारी व्यवस्था समाप्त नहीं हो जाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2008 के नियमों के तहत भी यदि सरकार यह दावा करती है कि किसी पूर्व सैनिक की दिव्यांगता सैन्य सेवा से attributable या aggravated नहीं है, तो इस दावे को साबित करने का दायित्व सरकार पर रहेगा।

अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि केवल Medical Board की राय के आधार पर पूर्व सैनिक को दिव्यांगता पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता, यदि लागू नियमों के तहत सरकार अपने दावे को पर्याप्त रूप से स्थापित नहीं कर पाती।


271 अपीलें हुईं खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा दायर सभी 271 अपीलों को खारिज कर दिया। इन अपीलों में AFT और विभिन्न हाई कोर्ट द्वारा पूर्व सैनिकों को दी गई दिव्यांगता पेंशन को चुनौती दी गई थी। इस फैसले से दिव्यांगता पेंशन से जुड़े मामलों में लागू 2008 के Entitlement Rules की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट हुई है। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि नियमों में बदलाव के बावजूद पूर्व सैनिकों के लिए उपलब्ध लाभकारी प्रावधानों और सरकार पर लागू प्रमाण के दायित्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।