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ट्रस्ट Juristic Person नहीं, उसे आरोपी नहीं बनाया जा सकता; सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही की रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के एक वित्तीय अनियमितता मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि ट्रस्ट का कोई अलग कानूनी अस्तित्व नहीं होता, इसलिए उसे आपराधिक मामले में आरोपी के रूप में शामिल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने ट्रस्ट के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी, हालांकि संबंधित ट्रस्टियों के खिलाफ चल रही कार्यवाही जारी रहेगी।

Sonali16 सित. 2026, 01:22 PM IST
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ट्रस्ट Juristic Person नहीं, उसे आरोपी नहीं बनाया जा सकता; सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही की रद्द

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक में वित्तीय अनियमितता से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि किसी ट्रस्ट को आपराधिक मामले में आरोपी के रूप में पेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि ट्रस्ट स्वयं एक Juristic Person नहीं होता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ट्रस्ट का कोई अलग कानूनी अस्तित्व नहीं होता और वह न तो अपने नाम से मुकदमा दायर कर सकता है और न ही उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने Madasa Masih-UI-Uloom Educational and Charitable Trust बनाम State of Karnataka मामले में यह फैसला सुनाया। पीठ ने कर्नाटक हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रस्ट के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करने से इनकार कर दिया गया था।


क्या है पूरा मामला?

मामला कर्नाटक में वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों से संबंधित था। इस मामले में संबंधित ट्रस्ट को भी आरोपी के रूप में शामिल किया गया था। ट्रस्ट ने आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और कहा कि कानून की नजर में ट्रस्ट को स्वयं एक अलग Juristic Person नहीं माना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट की इस दलील को स्वीकार करते हुए कहा कि ट्रस्ट मूल रूप से संपत्ति के स्वामित्व से जुड़ा एक दायित्व है, जो किसी अन्य व्यक्ति के लाभ के लिए बनाया जाता है। ट्रस्ट का अपने आप में ऐसा अलग कानूनी व्यक्तित्व नहीं होता, जिसके आधार पर वह स्वयं मुकदमा कर सके या उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके।


ट्रस्टियों की जिम्मेदारी अलग

पीठ ने स्पष्ट किया कि मुकदमे को बनाए रखने या उसका बचाव करने की जिम्मेदारी ट्रस्ट पर नहीं, बल्कि उसके ट्रस्टियों पर होती है। इसलिए ट्रस्ट को आरोपी के रूप में शामिल करना उचित नहीं है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ट्रस्ट को आरोपी के रूप में पेश नहीं किया जा सकता, क्योंकि उसे Juristic Person नहीं माना जा सकता।


2017 के फैसले का दिया हवाला

सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में Pratibha Pratisthan बनाम Manager, Canara Bank (2017) में दिए गए फैसले पर भरोसा किया। उस फैसले में भी ट्रस्ट के कानूनी स्वरूप को लेकर यही सिद्धांत सामने आया था। राज्य सरकार की ओर से इस निष्कर्ष का विरोध किया गया। राज्य ने दलील दी कि Sankar Padam Thapa बनाम Vijaykumar Dineshchandra Agarwal (2025) का फैसला वर्तमान मामले में लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि मौजूदा मामला भारतीय दंड संहिता के साथ-साथ Karnataka Protection of Interest of Depositors in Financial Establishments Act, 2004 के तहत कथित अपराधों से जुड़ा है।


लंबित बड़े पीठ के संदर्भ के बावजूद लागू रहेगा सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट ने राज्य की दलील को खारिज करते हुए कहा कि ट्रस्ट के Juristic Person होने या न होने का सवाल बड़े पीठ के समक्ष संदर्भित है। इसके बावजूद Pratibha Pratisthan में स्थापित कानूनी स्थिति और बाद में Sankar Padam Thapa मामले में उसका अनुसरण किए जाने से यह निष्कर्ष निकलता है कि ट्रस्ट ऐसा Juristic Person नहीं है, जो स्वयं मुकदमा कर सके या जिसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सके।


ट्रस्ट के खिलाफ कार्यवाही खत्म, ट्रस्टियों पर मामला जारी

इन आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए संबंधित ट्रस्ट के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि ट्रस्ट के ट्रस्टियों के खिलाफ जारी कार्यवाही पर इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में ट्रस्ट और उसके ट्रस्टियों की कानूनी स्थिति अलग-अलग है और केवल ट्रस्ट को आरोपी बनाकर उसके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी नहीं रखी जा सकती।