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तालाब में मछली पकड़ने का अधिकार ‘अचल संपत्ति’ से जुड़ा लाभ, एक साल से ज्यादा की अवधि पर लीज डीड का रजिस्ट्रेशन जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

जलाशय में मछली पकड़ने का अधिकार ‘Profit à Prendre’ यानी जमीन से मिलने वाला लाभ है और इसे स्टांप ड्यूटी के लिए अचल संपत्ति माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक साल से अधिक अवधि के लिए ऐसा अधिकार देने वाली डीड लीज मानी जाएगी, जिसका रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी अनिवार्य है।

Sonali16 सित. 2026, 01:22 PM IST
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तालाब में मछली पकड़ने का अधिकार ‘अचल संपत्ति’ से जुड़ा लाभ, एक साल से ज्यादा की अवधि पर लीज डीड का रजिस्ट्रेशन जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने मछली पकड़ने के अधिकार से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में कहा है कि किसी जलाशय में मछली पकड़ने और पकड़ी गई मछली को अपने साथ ले जाने का अधिकार ‘Profit à Prendre’ यानी भूमि से प्राप्त होने वाला लाभ है। इसलिए स्टांप ड्यूटी के उद्देश्य से इसे अचल संपत्ति माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक साल से अधिक अवधि के लिए ऐसा अधिकार दिए जाने वाला दस्तावेज लीज की श्रेणी में आएगा और उसका अनिवार्य रूप से पंजीकरण कराना होगा तथा उस पर उचित स्टांप ड्यूटी भी देनी होगी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने Zaki Ullah Khan बनाम State of U.P. मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें उत्तर प्रदेश के अधिकारियों द्वारा अपीलकर्ता को 15,72,525 रुपये की कमी वाली स्टांप ड्यूटी जमा करने का निर्देश सही ठहराया गया था।


तीन साल के लिए दिए गए थे मछली पकड़ने के अधिकार

मामला उत्तर प्रदेश के पीलीभीत स्थित शारदा सागर जलाशय का है। अपीलकर्ता के पक्ष में वर्ष 1998 से 2001 तक तीन साल की अवधि के लिए मछली पकड़ने का अधिकार देने वाला दस्तावेज निष्पादित किया गया था। बाद में अधिकारियों ने इस दस्तावेज पर कम स्टांप ड्यूटी दिए जाने का पता लगाया और 15,72,525 रुपये की अतिरिक्त स्टांप ड्यूटी की मांग की। अपीलकर्ता ने इस मांग को चुनौती दी और मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अधिकारियों के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।


क्या थी अपीलकर्ता की दलील?

अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि उसे पूरे साल मछली पकड़ने की अनुमति नहीं थी। उत्तर प्रदेश मत्स्य विकास निगम लिमिटेड की अनुमति के तहत हर साल केवल 10 महीने मछली पकड़ने की गतिविधि की जा सकती थी। इसलिए उसके अनुसार यह लाइसेंस एक वर्ष से अधिक अवधि का नहीं माना जा सकता और उस पर अनिवार्य रजिस्ट्रेशन तथा लीज के रूप में स्टांप ड्यूटी लागू नहीं होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि मछली पकड़ने की अनुमति और मछली पकड़ने का लाइसेंस दो अलग-अलग चीजें हैं। मछली पकड़ने पर कुछ अवधि के लिए रोक उत्तर प्रदेश मत्स्य अधिनियम, 1948 और उत्तर प्रदेश मत्स्य (विकास एवं नियंत्रण) नियम, 1954 के तहत लगाई गई थी।


10 महीने की पाबंदी से लाइसेंस की अवधि कम नहीं होती

पीठ ने कहा कि जलाशय में साल के 10 महीने मछली पकड़ने की अनुमति देना संबंधित कानून और नियमों के अनुरूप नियामक प्रतिबंध था। कुछ समय के लिए मछली पकड़ने पर वैधानिक रोक होने का यह मतलब नहीं है कि तीन साल के लिए दिया गया लाइसेंस एक साल से कम अवधि का हो गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मछली पकड़ने की गतिविधि पर लगाई गई मौसमी पाबंदी लाइसेंस की वास्तविक अवधि को नहीं बदलती।


मछली पकड़ने का अधिकार ‘Profit à Prendre’

सुप्रीम कोर्ट ने 1955 के संविधान पीठ के फैसले Anand Behera & Anr. बनाम State of Orissa & Anr. पर भरोसा किया। इस फैसले में अदालत ने माना था कि मछली पकड़ने का अधिकार ‘Profit à Prendre’ है और यह भूमि से प्राप्त होने वाला लाभ होने के कारण स्टांप ड्यूटी के उद्देश्य से अचल संपत्ति की श्रेणी में आता है। मौजूदा मामले में भी कोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति को तालाब या जलाशय में मछली पकड़ने और उसे ले जाने का अधिकार दिया जाता है, तो यह भूमि से जुड़े लाभ का अधिकार है। इसलिए ऐसा दस्तावेज स्टांप ड्यूटी के उद्देश्य से संबंधित कानून के तहत आता है।


तीन साल की अवधि होने से रजिस्ट्रेशन अनिवार्य

पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के पक्ष में मछली पकड़ने का अधिकार तीन साल के लिए दिया गया था। इसलिए यह दस्तावेज एक साल से अधिक अवधि की लीज के रूप में माना जाएगा। अदालत ने यह भी कहा कि 100 रुपये से अधिक मूल्य की ऐसी लीज का अनिवार्य पंजीकरण आवश्यक है और उस पर लागू स्टांप ड्यूटी का भुगतान करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए अपील खारिज कर दी। इस फैसले के साथ अदालत ने स्पष्ट किया कि जलाशय में मछली पकड़ने का अधिकार केवल एक साधारण अनुमति नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार यह भूमि से जुड़े कानूनी लाभ के रूप में अचल संपत्ति के दायरे में आ सकता है।