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JJ Act: केयर होम से निकलने वाले युवाओं के लिए 1% आरक्षण, किशोरों के आकलन में ‘मैकेनिकल’ रवैये पर राजस्थान हाई कोर्ट सख्त
राजस्थान हाई कोर्ट ने Juvenile Justice Act के तहत किशोरों के प्रारंभिक आकलन में लापरवाही और ‘मैकेनिकल’ तरीके पर गंभीर चिंता जताई है। जस्टिस अनूप कुमार धंध की पीठ ने हर जिले में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक और बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञों का पैनल बनाने का निर्देश दिया। साथ ही, केयर होम से बाहर निकलने वाले युवाओं (Care Leavers) के लिए 1% आरक्षण सुनिश्चित करने को कहा।

राजस्थान हाई कोर्ट ने Juvenile Justice Act (JJ Act) के तहत किशोरों के प्रारंभिक आकलन में सामने आ रही खामियों पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने प्रत्येक जिले में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक और बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञों का पैनल गठित करने का निर्देश दिया है, ताकि किशोरों का आकलन केवल औपचारिक या ‘मैकेनिकल’ तरीके से न किया जाए। जस्टिस अनूप कुमार धंध की पीठ ने यह निर्देश Section 15 of the Juvenile Justice Act के तहत होने वाले preliminary assessment से जुड़े मामले में दिया। कोर्ट ने कहा कि किशोरों से संबंधित मामलों में मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का सही आकलन बेहद महत्वपूर्ण है।
प्रारंभिक आकलन में खामियों पर चिंता
JJ Act की धारा 15 के तहत 16 से 18 वर्ष की आयु के बच्चों द्वारा किए गए गंभीर अपराधों के मामलों में प्रारंभिक आकलन किया जाता है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य बच्चे की मानसिक और शारीरिक क्षमता, अपराध के परिणामों को समझने की क्षमता और परिस्थितियों का मूल्यांकन करना है। हाई कोर्ट ने पाया कि कई मामलों में यह प्रक्रिया अपेक्षित विशेषज्ञता के बिना की जा रही है। अदालत ने ऐसे आकलन में विशेषज्ञों की भूमिका सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
हर जिले में बनेगा विशेषज्ञ पैनल
कोर्ट ने प्रत्येक जिले में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, मनोचिकित्सक और Child Psychology के विशेषज्ञों का पैनल गठित करने का निर्देश दिया। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किशोर के संबंध में कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेने से पहले उसकी मानसिक और मनोवैज्ञानिक स्थिति का उचित मूल्यांकन हो। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि JJ Act का उद्देश्य केवल अपराध की प्रकृति को देखना नहीं, बल्कि बच्चे के सर्वोत्तम हित, पुनर्वास और सामाजिक पुनर्स्थापन को भी ध्यान में रखना है।
केयर होम से निकलने वाले युवाओं की स्थिति पर भी ध्यान
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने उन युवाओं की स्थिति पर भी चिंता जताई, जिन्हें बाल देखभाल संस्थानों या care homes से बाहर निकलने के बाद अपने जीवन की शुरुआत करनी पड़ती है। ऐसे युवाओं को शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। अदालत ने care leavers के लिए 1% आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। कोर्ट का उद्देश्य ऐसे युवाओं को मुख्यधारा में आने और स्वतंत्र जीवन शुरू करने के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराना है।
पुनर्वास और अवसरों पर जोर
हाई कोर्ट ने कहा कि बाल देखभाल संस्थानों से निकलने के बाद युवाओं को अचानक सहायता व्यवस्था से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। उन्हें शिक्षा, रोजगार और अन्य आवश्यक अवसरों तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी है। अदालत के निर्देश JJ Act के तहत किशोर न्याय व्यवस्था में विशेषज्ञता, उचित आकलन और care leavers के पुनर्वास पर जोर देते हैं। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को इन निर्देशों के प्रभावी अनुपालन की दिशा में कदम उठाने को कहा है।
