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स्लम एरिया घोषित होने से पहले शुरू हुई बेदखली डिक्री की कार्यवाही नहीं रुकेगी, बाद की घोषणा से परमिशन जरूरी नहीं: बॉम्बे HC

बॉम्बे हाई कोर्ट ने बेदखली डिक्री से जुड़े मामले में स्पष्ट किया कि संपत्ति को बाद में स्लम एरिया घोषित किए जाने से पहले से शुरू हुई Execution Proceedings पर रोक नहीं लगती। कोर्ट ने कहा कि स्लम घोषित होने के बाद भी पहले से शुरू बेदखली की कार्यवाही के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति जरूरी नहीं है।

Sonali16 सित. 2026, 01:23 PM IST
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स्लम एरिया घोषित होने से पहले शुरू हुई बेदखली डिक्री की कार्यवाही नहीं रुकेगी, बाद की घोषणा से परमिशन जरूरी नहीं: बॉम्बे HC


बॉम्बे हाई कोर्ट ने बेदखली डिक्री के अमल से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी संपत्ति को बाद में स्लम एरिया घोषित किए जाने से पहले से शुरू हुई Execution Proceedings की वैधता प्रभावित नहीं होती। कोर्ट ने कहा कि यदि संपत्ति को स्लम क्षेत्र घोषित किए जाने से पहले ही बेदखली डिक्री के अमल की कार्यवाही शुरू हो चुकी है, तो केवल बाद की स्लम घोषणा के आधार पर महाराष्ट्र स्लम एरिया (इम्प्रूवमेंट, क्लीयरेंस एंड रिडेवलपमेंट) एक्ट, 1971 की धारा 22(1)(b) के तहत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति लेना जरूरी नहीं होगा। जस्टिस अरुण आर. पेडणेकर ने Sachin S/o Purshottam Poojari बनाम Miss. Flymi Sadanandan मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने Small Causes Court की Appellate Bench के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।


क्या है मामला?

मामले में प्रतिवादियों के पक्ष में 24 अगस्त 2015 को बेदखली की डिक्री पारित हुई थी। इस डिक्री को अपील में चुनौती दी गई। इसके बाद प्रतिवादियों ने वर्ष 2016 में डिक्री के अमल के लिए Execution Application दाखिल की। इसी दौरान याचिकाकर्ता ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 47 के तहत आपत्ति दाखिल की। Execution Proceedings लंबित रहने के दौरान 18 दिसंबर 2018 को उस बड़ी संपत्ति को, जिसमें विवादित परिसर भी शामिल था, महाराष्ट्र स्लम एरिया एक्ट की धारा 4(1) के तहत स्लम एरिया घोषित कर दिया गया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने दलील दी कि संपत्ति के स्लम एरिया घोषित होने के बाद बेदखली डिक्री को लागू करने के लिए सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति आवश्यक है। इसी आधार पर Execution Proceedings पर आपत्ति जताई गई।


याचिकाकर्ता की दलील

याचिकाकर्ता का कहना था कि महाराष्ट्र स्लम एरिया एक्ट की धारा 22(1)(b) के तहत सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के बिना बेदखली से संबंधित कार्रवाई नहीं की जा सकती। चूंकि संपत्ति को अब स्लम एरिया घोषित किया जा चुका है, इसलिए डिक्री के अमल के लिए भी अनुमति लेना जरूरी है। दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने कहा कि Execution Application वर्ष 2016 में दाखिल की गई थी, जबकि संपत्ति को स्लम एरिया 18 दिसंबर 2018 को घोषित किया गया। इसलिए कार्यवाही शुरू होने के समय स्लम एरिया संबंधी अनुमति की कोई आवश्यकता नहीं थी।


हाई कोर्ट ने क्या कहा?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि मामले में मुख्य सवाल यह है कि क्या किसी संपत्ति को बाद में स्लम एरिया घोषित किए जाने के कारण पहले से शुरू हुई बेदखली डिक्री की Execution Proceedings को जारी रखने के लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य हो जाता है। कोर्ट ने इस सवाल का जवाब नकारात्मक में दिया। अदालत ने कहा कि यदि डिक्री के अमल की कार्यवाही संपत्ति को स्लम एरिया घोषित किए जाने से पहले ही शुरू हो चुकी थी, तो बाद की घोषणा अपने आप उस कार्यवाही को अवैध या निष्पादन योग्य नहीं बनाती। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाद में की गई स्लम घोषणा पहले से शुरू की गई Execution Proceedings की प्रकृति या वैधता को पूर्वव्यापी (retrospective) रूप से नहीं बदलती।


धारा 22 का प्रतिबंध किस पर लागू होता है?

हाई कोर्ट ने कहा कि महाराष्ट्र स्लम एरिया एक्ट की धारा 22 के तहत सक्षम प्राधिकारी की पूर्व अनुमति का प्रतिबंध मुख्य रूप से ऐसी कार्यवाही की शुरुआत पर लागू होता है, जिसे कानून के तहत अनुमति के बिना शुरू किया जाना प्रतिबंधित है। अदालत ने कहा कि केवल इस कारण से कि कार्यवाही शुरू होने के बाद संबंधित संपत्ति को स्लम एरिया घोषित कर दिया गया, पहले से शुरू की गई बेदखली डिक्री की Execution Proceedings को रोकना उचित नहीं होगा।


याचिका खारिज

इन निष्कर्षों के आधार पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संपत्ति की बाद की स्लम घोषणा अपने आप पहले से शुरू हुई बेदखली डिक्री के अमल पर रोक नहीं लगाती और केवल इसी आधार पर सक्षम प्राधिकारी की अनुमति की आवश्यकता पैदा नहीं होती।