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10 साल पुराने रेप प्रयास केस में आरोपी बरी, पीड़िता और मां ने कोर्ट में आरोपों का समर्थन नहीं किया; कल्याण कोर्ट का फैसला
कल्याण की अदालत ने करीब 10 साल पुराने रेप के प्रयास के मामले में आरोपी को बरी कर दिया। सुनवाई के दौरान पीड़िता और उसकी मां ने अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया, जिसके बाद कोर्ट ने कहा कि आरोपी के खिलाफ आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं हैं।

कल्याण की अतिरिक्त सत्र अदालत ने करीब 10 साल पुराने रेप के प्रयास के मामले में 53 वर्षीय आरोपी संजय दत्ताराम यादव को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि मुकदमे के दौरान पीड़िता और उसकी मां ने अभियोजन की कहानी का समर्थन नहीं किया और कथित घटना से इनकार किया। अभियोजन आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा, जिसके बाद कोर्ट ने IPC की धारा 376 सहपठित धारा 511, 323, 504 और 201 के तहत आरोपी को बरी कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (FTSC) P.P. Muley ने 15 सितंबर 2026 को यह फैसला सुनाया। मामला खड़कपाड़ा पुलिस स्टेशन में दर्ज CR No. 190/2016 से संबंधित था। घटना 18 जून 2016 की बताई गई थी और उसी दिन FIR दर्ज की गई थी।
सौतेली बेटी ने लगाया था गंभीर आरोप
अभियोजन के अनुसार, आरोपी अपनी सौतेली बेटी के साथ कल्याण स्थित घर में रहता था। आरोप था कि 18 जून 2016 की शाम करीब 6 बजे घरेलू विवाद के बाद आरोपी पीड़िता के कमरे में गया और उसके साथ जबरदस्ती करने का प्रयास किया। शिकायत में आरोपी पर पीड़िता के साथ आपराधिक बल का इस्तेमाल करने, उसे बिस्तर पर खींचने और जबरन शारीरिक संबंध बनाने की कोशिश करने का आरोप लगाया गया था। यह भी आरोप था कि शोर सुनकर पीड़िता की मां वहां पहुंची और उसने अपनी बेटी को बचाया। अभियोजन ने आरोपी पर पीड़िता और उसकी मां के साथ मारपीट करने, गाली-गलौज करने और सबूत मिटाने की कोशिश करने के आरोप भी लगाए थे। कोर्ट में पीड़िता ने नहीं किया अभियोजन का समर्थन मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने पीड़िता और उसकी मां को मुख्य गवाह के तौर पर पेश किया। हालांकि, दोनों ने अदालत के सामने अभियोजन के आरोपों का समर्थन नहीं किया। पीड़िता ने कथित घटना से साफ तौर पर इनकार किया। अभियोजन पक्ष ने उससे जिरह करते हुए कई सवाल पूछे, लेकिन वह अपने बयान पर कायम रही और कथित यौन हमले की घटना को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने पीड़िता के 164 CrPC के तहत दर्ज बयान और FIR के बीच भी महत्वपूर्ण अंतर पाया। कोर्ट के अनुसार, 1 अक्टूबर 2016 को मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान में पीड़िता ने कहा था कि घटना वाले दिन वह अपने दोस्त के साथ फिल्म देखने गई थी और देर से घर लौटी थी। उसने यह भी बताया था कि आरोपी उसे अक्सर मारता था और इसी वजह से उसने शिकायत की थी।
मां के बयान से भी अभियोजन को नहीं मिली मदद
पीड़िता की मां ने भी अदालत में अभियोजन के मामले का समर्थन नहीं किया। उसके 164 CrPC के बयान में सामने आया कि आरोपी ने पीड़िता के देर से घर लौटने पर उसे पीटा था। मां ने यह भी कहा था कि वह अपने परिवार के लिए आरोपी के साथ रहना चाहती थी। कोर्ट ने कहा कि दोनों गवाहों ने अदालत में कथित घटना से इनकार किया है। मेडिकल रिपोर्ट में भी पीड़िता के शरीर पर किसी चोट का उल्लेख नहीं था। घर और घटनास्थल की तलाशी के दौरान भी ऐसा कोई महत्वपूर्ण सामान बरामद नहीं हुआ, जिससे अभियोजन के आरोपों की पुष्टि हो सके।
‘आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए’
अदालत ने कहा कि अभियोजन द्वारा पेश साक्ष्यों के आधार पर आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं किया जा सका। पीड़िता और उसकी मां की गवाही कथित घटना का समर्थन नहीं करती थी और मारपीट, गाली-गलौज तथा सबूत मिटाने के आरोपों को साबित करने के लिए भी पर्याप्त एवं ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया।
इसके बाद कोर्ट ने संजय दत्ताराम यादव को IPC की धारा 376/511, 323, 504 और 201 के आरोपों से बरी कर दिया। उनका जमानत बांड रद्द कर दिया गया और जमानतदार को मुक्त कर दिया गया। हालांकि, CrPC की धारा 437-A के अनुपालन में उन्हें ₹15,000 के व्यक्तिगत बॉन्ड और इतनी ही राशि की जमानत प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया।
यह मामला 14 दिसंबर 2016 को दर्ज हुआ था और 15 सितंबर 2026 को करीब 10 साल बाद इसका फैसला आया।
