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भिवंडी में संपत्ति विवाद पर कोर्ट का फैसला, 80 वर्षीय भाई ने मांगा था कमरे का कब्जा; अदालत ने लागत के साथ मुकदमा किया खारिज

भिवंडी में 80 वर्षीय व्यक्ति ने भाई से कमरे का कब्जा वापस लेने के लिए मुकदमा दायर किया, लेकिन अदालत ने याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि वादी अपना वैध स्वामित्व साबित नहीं कर सके और 1964 के बताए गए किरायानामे की प्रमाणिकता पर भी सवाल हैं।

Sonali17 सित. 2026, 03:57 PM IST
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भिवंडी में संपत्ति विवाद पर कोर्ट का फैसला, 80 वर्षीय भाई ने मांगा था कमरे का कब्जा; अदालत ने लागत के साथ मुकदमा किया खारिज

भिवंडी की अदालत ने एक पारिवारिक संपत्ति विवाद में 80 वर्षीय व्यक्ति की ओर से दायर कब्जा, स्वामित्व की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि वादी संपत्ति पर अपना स्वामित्व और कब्जा कानूनी रूप से साबित करने में सफल नहीं रहे। साथ ही, जिस किरायानामा के आधार पर स्वामित्व का दावा किया गया था, वह पंजीकृत नहीं था और उसके दस्तावेज को लेकर भी गंभीर सवाल सामने आए। 3rd Joint Civil Judge (Junior Division), भिवंडी के न्यायाधीश एम.वी. भगवत ने 15 सितंबर 2026 को Regular Civil Suit No. 354/2022 में यह फैसला सुनाया।


मामला भिवंडी के नारपोली-1, सोमा नगर स्थित म्युनिसिपल हाउस नंबर 372 के 10x12 फीट के एक कमरे से जुड़ा था। वादी मोहम्मद उमर अब्दुल गफार मोमिन ने अपने छोटे भाई मोहम्मद इम्तियाज अब्दुल गफार मोमिन के खिलाफ मुकदमा दायर कर कमरे का कब्जा वापस दिलाने, स्वामित्व की घोषणा और प्रतिवादी को हस्तक्षेप से रोकने की मांग की थी। वादी का दावा था कि संबंधित मकान मूल मालिक तुलसीबाई घरत से 18 सितंबर 1964 के किरायानामे के जरिए उन्हें मिला था। बाद में मकान उनके नाम पर नगरपालिका रिकॉर्ड में दर्ज हुआ और उन्होंने मकान में चार कमरे बनाए। वादी के अनुसार, उन्होंने अपने भाई और उसके परिवार को एक कमरे में रहने की अनुमति दी थी, लेकिन बाद में कमरा खाली करने को कहने पर भाई ने इनकार कर दिया और कथित तौर पर धमकी भी दी। वहीं, प्रतिवादी ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि मकान उनके पिता ने खरीदा था और वह वर्ष 1965 से परिवार के अन्य सदस्यों के साथ वहां रह रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वादी ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर मकान अपने नाम कराया और बिजली मीटर भी अपने नाम करवा लिया।


अदालत ने वादी की ओर से पेश दस्तावेजों की जांच के बाद पाया कि नगरपालिका रिकॉर्ड में नाम दर्ज होना अपने आप में स्वामित्व साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि वादी यह साबित नहीं कर सके कि नगरपालिका रिकॉर्ड में उनका नाम किस वैध स्वामित्व दस्तावेज के आधार पर दर्ज किया गया था। किरायानामे पर भी अदालत ने गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट के अनुसार, दस्तावेज में किरायानामा 1964 का बताया गया था, जबकि जिस स्टांप पेपर पर वह तैयार किया गया था, वह वर्ष 1980 में खरीदा गया था। जिरह के दौरान वादी ने भी स्टांप पेपर वर्ष 1980 में खरीदे जाने की बात स्वीकार की। अदालत ने कहा कि ऐसे में दस्तावेज के बाद में तैयार किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, अदालत ने माना कि संबंधित किरायानामा पंजीकृत नहीं था। अदालत ने संपत्ति हस्तांतरण कानून और पंजीकरण कानून के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा कि इस दस्तावेज को स्वामित्व और कब्जे के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने प्रतिवादी द्वारा पेश गैस कनेक्शन प्रमाणपत्र, चुनाव पहचान पत्र, कैब ड्राइवर पहचान पत्र और राशन कार्ड जैसे दस्तावेजों का भी उल्लेख किया। इन दस्तावेजों से संकेत मिलता था कि प्रतिवादी संबंधित कमरे में लंबे समय से रह रहा था, विशेष रूप से वर्ष 1994 से पहले से। कोर्ट ने यह भी कहा कि मूल मालिक या उनके कानूनी वारिसों को मुकदमे में पक्षकार नहीं बनाया गया था। इसलिए वादी के स्वामित्व की घोषणा का फैसला उनके बिना नहीं किया जा सकता था। इन सभी कारणों से अदालत ने वादी द्वारा स्वामित्व, प्रतिवादी द्वारा अवैध कब्जा और कब्जा वापस लेने के अधिकार को साबित नहीं माना। अदालत ने स्वामित्व की घोषणा, कब्जा और निषेधाज्ञा की सभी मांगें खारिज करते हुए मुकदमा लागत के साथ खारिज कर दिया और डिक्री तैयार करने का आदेश दिया।