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घरेलू हिंसा की शिकायत में देरी मात्र से केस खारिज नहीं किया जा सकता: केरल हाईकोर्ट

घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने में देरी को लेकर केरल हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शिकायत में देरी होने के आधार पर घरेलू हिंसा कानून के तहत चल रही कार्यवाही को खारिज नहीं किया जा सकता, खासकर जब शिकायत में बाद की अवधि में हुई घरेलू हिंसा के आरोप भी शामिल हों।

Sonali17 सित. 2026, 03:57 PM IST
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घरेलू हिंसा की शिकायत में देरी मात्र से केस खारिज नहीं किया जा सकता: केरल हाईकोर्ट

केरल हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी अपने आप में कार्यवाही रद्द करने का आधार नहीं बन सकती। अदालत ने कहा कि खासकर तब, जब शिकायत में बाद के समय में हुई घरेलू हिंसा की घटनाओं का भी आरोप लगाया गया हो, केवल शिकायत दर्ज कराने में देरी के आधार पर पूरी कार्यवाही को खत्म नहीं किया जा सकता। जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया, जिसमें पति और उसकी मां ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत लंबित कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी। यह कार्यवाही त्रिशूर स्थित न्यायिक प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट कोर्ट-III के समक्ष लंबित थी। याचिका भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत दायर की गई थी।

पति और सास ने छह साल की देरी पर उठाया सवाल

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत कार्यवाही शुरू करने में करीब छह साल की देरी हुई और इस देरी का कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। उनका यह भी कहना था कि शिकायत में घरेलू हिंसा के विशिष्ट कृत्यों का पर्याप्त विवरण नहीं दिया गया है। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि संबंधित महिला ने इस अवधि के दौरान विभिन्न अधिकारियों के समक्ष शिकायतें की थीं, लेकिन घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम की धारा 12 के तहत संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन नहीं दिया था। इसी आधार पर उन्होंने शिकायत की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया। पति और उसकी मां ने यह भी तर्क दिया कि कार्यवाही ऐसे समय शुरू की गई, जब परिवार न्यायालय में पहले से मुकदमे चल रहे थे और एक पॉक्सो मामले से संबंधित कार्यवाही भी हुई थी। उनका दावा था कि घरेलू हिंसा की शिकायत पहले की कानूनी कार्यवाहियों के बाद प्रतिशोध के तौर पर दर्ज कराई गई।

महिला ने कहा- कानून में कोई समय-सीमा नहीं

महिला की ओर से दलील दी गई कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत आवेदन दाखिल करने के लिए कानून में कोई निर्धारित परिसीमा नहीं है। इसलिए केवल इस आधार पर शिकायत को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसे दाखिल करने में देरी हुई। उन्होंने विशेष रूप से मई 2025 में हुई कथित घरेलू हिंसा की घटना का उल्लेख किया। उनका कहना था कि यदि शिकायत में बाद की अवधि में हुई घरेलू हिंसा का आरोप भी शामिल है, तो केवल पुराने घटनाक्रम और शिकायत दर्ज कराने के बीच के अंतराल को आधार बनाकर आरोपों को झूठा नहीं माना जा सकता।

देरी अपने आप में कार्यवाही खत्म करने का आधार नहीं

केरल हाईकोर्ट ने मामले पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा की शिकायत में देरी को अकेले ऐसा आधार नहीं माना जा सकता, जिसके कारण मजिस्ट्रेट के समक्ष लंबित पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया जाए। अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि शिकायत में बाद के समय में घरेलू हिंसा की घटना का आरोप लगाया गया था। ऐसे में शिकायत दर्ज करने में हुई देरी की मौजूदगी मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कार्यवाही झूठी या दुर्भावनापूर्ण है। यह फैसला घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत दायर शिकायतों को केवल देरी के आधार पर चुनौती देने के संबंध में महत्वपूर्ण है। हालांकि, प्रत्येक मामले में आरोपों और उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर अदालत अलग-अलग परिस्थितियों पर विचार कर सकती है।