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अंतरधार्मिक विवाह करने वाली बालिग महिला को पिता नहीं कर सकते मजबूर, अपनी मर्जी से पति के साथ रहने का अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

अंतरधार्मिक विवाह करने वाली एक बालिग महिला को पिता की हिरासत से मुक्त करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि बालिग महिला को अपनी पसंद से यह तय करने का अधिकार है कि वह किसके साथ रहना चाहती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता उसे उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते।

Sonali17 सित. 2026, 03:57 PM IST
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अंतरधार्मिक विवाह करने वाली बालिग महिला को पिता नहीं कर सकते मजबूर, अपनी मर्जी से पति के साथ रहने का अधिकार: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाली एक बालिग महिला को उसके पिता की हिरासत से मुक्त करते हुए कहा कि बालिग महिला को यह तय करने का कानूनी अधिकार है कि वह किसके साथ रहना चाहती है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पिता अपनी बालिग बेटी को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। अदालत ने महिला की इच्छा जानने के बाद उसे पिता की हिरासत से मुक्त करने का निर्देश दिया। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की पीठ ने यह आदेश प्रिंसी की ओर से उसके पति और नेक्स्ट फ्रेंड गुरप्रीत सिंह द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनाया। सुनवाई के दौरान महिला ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने पति के साथ रहना चाहती है और उसके पिता उसे पति के पास जाने नहीं दे रहे हैं।

सोशल मीडिया के जरिए हुई थी मुलाकात

याचिका के अनुसार, प्रिंसी की फरवरी 2025 में सोशल मीडिया के माध्यम से गुरप्रीत सिंह से मुलाकात हुई थी। इसके बाद वह 19 सितंबर 2025 को अपनी इच्छा से अपने माता-पिता का घर छोड़कर नोएडा चली गई और गुरप्रीत सिंह के साथ रहने लगी। अदालत के समक्ष बताया गया कि महिला हिंदू धर्म से है, जबकि उसका पति सिख धर्म का पालन करता है। दोनों के संबंध का महिला के परिवार ने विरोध किया था। दंपति के अनुसार, उन्होंने 4 नवंबर 2025 को नोएडा के एक मंदिर में विवाह किया था और इसके बाद पति-पत्नी के रूप में रह रहे थे।

राखी बांधने के लिए घर बुलाने के बाद हिरासत का आरोप

याचिका में आरोप लगाया गया कि बाद में महिला के परिवार ने उसे भाइयों को राखी बांधने के लिए घर बुलाया। आरोप है कि घर पहुंचने के बाद उसके पिता और परिवार के अन्य सदस्यों ने उसे वहीं रोक लिया और उसे पति के पास वापस जाने नहीं दिया। महिला ने कथित तौर पर अपने पति को संदेश भेजकर परिवार के सदस्यों द्वारा मारपीट और प्रताड़ित किए जाने की शिकायत की तथा उसे वहां से निकालने के लिए मदद मांगी। पति ने पुलिस से संपर्क किया, लेकिन जब अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई तो उसने हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की।

पिता ने विवाह की वैधता पर उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान पिता की ओर से महिला और गुरप्रीत सिंह के मंदिर में हुए विवाह की वैधता पर सवाल उठाया गया। दलील दी गई कि दोनों ने विवाह का दावा तो किया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया कि हिंदू विवाह की आवश्यक रस्म ‘सप्तपदी’ पूरी की गई थी या नहीं। पिता की ओर से इस संबंध में पूर्व के कुछ न्यायिक फैसलों का भी हवाला दिया गया। हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि उन मामलों की परिस्थितियां वर्तमान मामले से अलग थीं। उन मामलों में संबंधित महिलाओं ने स्वयं विवाह की वैधता पर विवाद किया था, जबकि मौजूदा मामले में महिला ने अपने विवाह की वैधता को चुनौती नहीं दी है।

विवाह की वैधता से अलग है महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता

हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में विवाह वैध है या नहीं, यह सवाल महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित नहीं करता। अदालत ने कहा कि बालिग होने के कारण महिला को अपने पिता के साथ नहीं रहने और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का कानूनी अधिकार है।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘सोनी गेरी बनाम गेरी डगलस’ फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद से निर्णय लेने का अधिकार है और अदालत को उसकी जगह निर्णय लेने वाले ‘सुपर गार्जियन’ की भूमिका नहीं निभानी चाहिए।

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने ‘शफीन जहां बनाम अशोकन के.एम.’ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी भरोसा किया। इसमें व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता को संवैधानिक संरक्षण से जोड़ा गया था तथा कहा गया था कि जीवनसाथी का चुनाव व्यक्ति के निजी निर्णय के दायरे में आता है।

इन सिद्धांतों को लागू करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला को पिता की हिरासत से मुक्त करने का आदेश दिया। अदालत ने कहा कि बालिग महिला अपनी इच्छा के अनुसार रहने का निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है और उसके पिता उसे अपनी इच्छा के विरुद्ध अपने साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकते।